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Category: समाज

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सस्ता ताज़ा खाद्य न मिलने से बढ़ती है गरीबों की रोगबाधा, प्रशासन की नीति‑अधूरापन उजागर

राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य मूल्यों में इस वर्ष लगभग पचास प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। किराए, बिजली‑बिल और इन सबके बाद बजट का केवल कुछ ही प्रतिशत बचता है, जिसके कारण कई मिलकर परिवार अपनी भोजन की गुणवत्ता, मात्रा और विविधता में कटौती कर रहे हैं। यह कटौती तब तक आँकड़ों में नहीं दिखती जब तक रोगों का दंगल सामने नहीं आता, पर असल में परिवार कई महीनों से ही पोषण की कमी सहन कर रहे हैं।

एक राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय सामाजिक संस्था "सस्ती भोजन क्लब" ने 2025 में 8,500 से अधिक सदस्य परिवारों पर सर्वेक्षण किया। परिणाम से पता चला कि जहाँ घर के खर्चे घटाने के बाद सिर्फ दो‑तीन हजार रुपये बचते हैं, वहाँ 87 % लोगों ने अपनी समग्र स्वास्थ्य स्थिति को "अच्छा नहीं" कहा। यह आँकड़ा दर्शाता है कि आर्थिक दबाव और पोषण में गिरावट का सीधा संबंध है।

सरकार ने कई बार "सभी के लिए पोषक भोजन" की घोषणाएँ कीं, पर नीतियों का कार्यान्वयन अक्सर कागज़ी बयानों तक सीमित रह गया है। मूल्य नियंत्रण पर अस्थायी उपाय अपनाए गए, पर बाजार में ताज़ा सब्जियों और फलों की कीमतें फिर भी सामान्य से ऊपर ही बनी रहती हैं। ऐसा लगता है कि जब तक मंत्रीमंडल "रसोई के बर्तन" तक नहीं पहुँचाता, तब तक ताज़ा खाद्य की महँगाई का कोई अंत नहीं दिखेगा।

इन सरकारी चूक के बीच, "सस्ती भोजन क्लब" ने खुद को उत्तराखंड से तमिलनाडु तक के छोटे‑से‑छोटे कस्बों में स्थापित किया है। यह क्लब हर हफ्ते 10,000 से अधिक परिवारों को किफायती ताज़ा वज़न, सब्ज़ी और फल उपलब्ध कराता है। केवल पिछले सप्ताह 439 नए सदस्य इस नेटवर्क में जुड़े, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लोगों को आधिकारिक मदद की अपेक्षा स्वयं की पहल पर भरोसा है।

पोषण की कमी केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि शिक्षा पर भी असर डालती है। कुपोषित बच्चों की पढ़ाई में एकाग्रता घटती है, स्कूल की उपस्थिति पर प्रतिबिंबित होती है और भविष्य की उत्पादकता में कमी आती है। नगर निकायों की अनियमित बाजार निगरानी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमज़ोर पहुँच, और मौजूदा सब्सिडी ढाँचे की अक्षमता इन समस्याओं को और जटिल बनाती है।

अब सवाल यह है कि क्या सरकार अपने मौजूदा खाद्य नीति को पुनः समझेगी, मूल्य नियंत्रण को स्थायी बना सकेगी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करके असमानता को कम कर सकेगी, और इस प्रकार निरंतर स्वास्थ्य‑संभावना वाले नागरिकों की नींव रखेगी। जनता की आशा तब ही पूरी होगी जब जवाबदेही का सिद्धांत नीतियों में, बजट में और जमीन पर समान रूप से लागू हो।

Published: May 7, 2026