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सरकारी मानसिक स्वास्थ्य नीति में अंतर: 10‑मिनट के ध्यान‑अभ्यास से आती राहत, लेकिन सुविधाएँ बन बँट रही हैं
राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययनकर्ता और मनो‑विज्ञान विशेषज्ञों ने हाल ही में यह सिद्ध किया कि रोज़ाना केवल दस मिनट का आध्यात्मिक अभ्यास—ध्यान, प्राणायाम या सरल ध्यान‑धारणा—अधिक सोच और चिंता (anxiety) को घटा सकता है। इस खोज का आश्रित स्वरूप, विशेषकर शहरी वर्ग में, एक सकारात्मक कदम के रूप में प्रशंसा पायाँ है।
लेकिन इस वैज्ञानिक संकेत के साथ ही भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में मौजूदा अंतर स्पष्ट रूप से उभरा है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, 2025 में लगभग 22 % भारतीय वयस्कों को गहन चिंता या अतिचिंतन के लक्षण दिखे थे, जबकि केवल 10 % ही योग्य चिकित्सकीय सहायता प्राप्त कर पाए। ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में यह अनुपात और अधिक दुर्मीला है; औसत दूरी 60 किमी से अधिक, और औसत प्रतीक्षा समय कई महीनों तक रहता है।
वित्तीय आंकड़ों की बारीकी से जांच करने पर स्पष्ट हो जाता है कि पिछले पाँच वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य के लिये कुल बजट केवल 0.3 % राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना के अन्तर्गत आवंटित हुआ है। नीति दस्तावेज़ों में “स्मार्ट सत्र” जैसी बातें शोरगुल मचाते हैं, पर वास्तव में कोई ठोस कार्यान्वयन योजना नहीं दिखती। जैसे‑जैसे “नॉशनल हेली‑टेक किट” की घोषणा की गई, वही पुरानी फाइलें, अधूरी समन्वय समिति, और अनगिनत “अगले वर्ष” के आश्वासन आगे ही रह गए।
यहाँ तक कि कई राज्यों में मनो‑स्वास्थ्य केंद्रों के लिये नियत शेड्यूल्ड निर्माण भी प्रशासनिक कागजी कार्रवाई और अनुबंध में देरी के कारण आधी रात तक रुके हैं। परिणामस्वरूप, कई परिवार को अपने घर की छत पर या निजी शिक्षक की मदद से 10‑मिनट का “आध्यात्मिक ब्रेक” ही एकमात्र उपचार बनना पड़ा है। यह स्थिति न केवल सामाजिक असमानता को गहरा करती है, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही को भी प्रश्नवाचक बनाती है।
एनजीओ और स्वयंस्वीकृत समूह इस अंतर को पाटने के प्रयास में छोटे‑छोटे सत्र आयोजित कर रहे हैं, पर वे भी अक्सर अनुदान के अभाव में सीमित रह जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार इस प्रकार के साक्ष्य‑आधारित उपायों को सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में सम्मिलित करे, तो “पुनरावर्ती चिंता” की सामाजिक लागत को काफी हद तक घटाया जा सकता है। अभी आवश्यक है बजट में स्पष्ट वृद्धि, ग्रामीण स्तर पर मनो‑स्वास्थ्य कर्मियों की भर्ती, और एक सुदृढ़ निगरानी तंत्र।
जब तक नीति‑पत्रों में “व्यावहारिक समाधान” शब्द केवल सिंगल‑स्पेस फ़ॉन्ट में ही रहता है, तब तक भारत के लाखों नागरिक वही बंधे रहेंगे—एक छोटे से 10‑मिनट के अभ्यास के भरोसे, लेकिन बड़े‑बड़े सरकारी अभाव की छाया में।
Published: May 9, 2026