जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: समाज

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

सरकारी निर्देशों के बावजूद स्कूल में पहला कदम: बच्चों और अभिभावकों का संघर्ष

शिक्षा मंत्रालय ने हाल ही में प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश के पहले महीने के लिये चार ‘सुपर सरल’ टिप्स जारी किए हैं—पूर्व‑स्कूल समय‑सारणी बनाना, स्कूल को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत करना, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना और धैर्य रखना। ये दिशानिर्देश अभिभावकों को शिक्षा की पहली सीढ़ी पर मदद करने के उद्देश्य से तैयार किए गये हैं।

वास्तविकता के दर्पण में ये सुझाव अक्सर अधूरी सुविधा और नीति‑कार्यान्वयन की खामियों से टकराते हैं। राष्ट्रीय शहरी गरीब परिवार सर्वेक्षण (2025) के अनुसार, 56 % परिवारों के पास व्यवस्थित पूर्व‑स्कूल देखभाल व्यवस्था नहीं है, जबकि 43 % बच्चों को अपनी ही घर की छत के नीचे या अनौपचारिक पड़ोस‑क्लासरूम में तैयारी करनी पड़ती है। इस अभाव में ‘रूटीन बनाना’ या ‘स्वतंत्रता विकसित करना’ मात्र शब्दार्थ बन जाता है।

शिक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, “हमने दिशा‑निर्देश जारी कर प्रारम्भिक शिक्षा को सुलभ बनाने का लक्ष्य रखा है।” परंतु राज्य‑स्तर पर कई जिलों में शैक्षिक कल्याण केन्द्रों की कमी और अपर्याप्त प्रशिक्षु शिक्षक ढांचा इस वचन को खाली कागज का टुकड़ा बनाता दिख रहा है। ग्रामीण और पृष्ठभूमि‑वर्गीय क्षेत्रों में स्कूल‑पहुँच वाले बच्चों को अक्सर लंबे यात्रा‑समय और असुरक्षित परिवहन के कारण स्कूल‑पहले दिन ही परित्याग का सामना करना पड़ता है।

इस प्रक्रिया में अभिभावकों के मनोवैज्ञानिक दबाव को नज़रअंदाज़ करना भी प्रशासनिक उदासीनता की जड़ है। ‘धैर्य रखना’ जैसा सकारात्मक संदेश, जबकि कई माँ‑बाप आर्थिक तंगी और सामाजिक असुरक्षा के बीच बच्चों को भावनात्मक समर्थन देने के लिए अपने ही दर्द को दबाते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता रैना पांढे ने कहा, “सरकारी मार्गदर्शिका में ‘सकारात्मक संवाद’ का उल्लेख है, परन्तु कई घरों में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है, जिससे परिवारों को तनाव का सामना करना पड़ता है।”

इन चुनौतियों को देखते हुए, नीति‑निर्माताओं को न केवल दिशानिर्देश बनाना चाहिए, बल्कि शैक्षणिक अवसंरचना, सस्ते और सुरक्षित स्कूल‑परिवहन, तथा पूर्व‑स्कूल देखभाल के लिए सार्वजनिक‑निजी भागीदारी मॉडल को तुरंत लागू करना आवश्यक है। अन्यथा, “चार आसान टिप्स” शब्दावली में बची रह गई बात यह होगी कि शासन के पास उपाय तो हैं, पर उनका कार्यान्वयन जड़ता में फँसा हुआ है।

Published: May 6, 2026