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Category: समाज

सफल कर्मचारियों के पाँच अनजाने आदतें और सार्वजनिक सेवाओं में उनका अभाव

नौकरी हासिल करना और उसमें उत्कृष्टता हासिल करना दो अलग-अलग दुनिया हैं। यह अंतर बड़े पदों की आडंबर में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के छोटे‑छोटे क्षणों में दिखता है – डेडलाइन के सामने धैर्य, बोरिंग कार्यों को उत्साह से करना, और स्वयं‑प्रेरणा। हाल ही में एक लोकप्रिय युवा उद्यमी ने सामाजिक मीडिया पर इन अनजाने आदतों को उजागर किया, जबकि यह बात अक्सर सरकारी कार्यालयों में अनसुनी रह जाती है।

भारत के सार्वजनिक सेक्टर में इस औसत‑से‑उच्च स्तर की कमी के मायने सिर्फ़ कर्मचारियों की व्यक्तिगत असफलता नहीं हैं; यह नागरिकों के जीवन‑स्तर पर सीधे असर डालता है। कई विभागों में फॉर्म भरने में दिन‑रात लगते हैं, रिज़ॉल्यूशन में अनगिनत पुनरावृत्ति होती है, और समय सीमा का उल्लंघन अक्सर मामला बन जाता है। यह व्यवस्था की विफलता वह नहीं है जो किसी नीति दस्तावेज़ में लिखी गई हो, बल्कि वह वास्तविकता है जहाँ ‘बोरिंग कार्य’ को कभी‑कभी ही नज़रअंदाज़ किया जाता है।

यहाँ पाँच प्रमुख आदतों को समझा जा सकता है, जो शीर्ष 1 % कर्मचारियों को बाकी से अलग करती हैं:

  • डेडलाइन के प्रति सजगता: समय सीमा के करीब आते ही पैनिक मोड में नहीं, बल्कि अग्रिम योजना बनाकर आगे बढ़ना। सार्वजनिक विभागों में अक्सर ‘अंतिम क्षण’ में संक्षिप्त आदेश आते हैं, जिससे सेवा में देरी होती है।
  • नीरस कार्यों का सम्मान: फाइलिंग, डेटा एंट्री, या दस्तावेज़ सत्यापन जैसे ‘बोरिंग’ कार्यों को गौरव के साथ करना। कई सरकारी शॉर्टकट में इन्हें घटिया माना जाता है, जबकि यह ही प्रक्रिया का मूल स्तम्भ है।
  • स्वयं‑प्रेरणा: बाहरी प्रशंसा की तलाश के बिना अपना काम करना। इस दिशा में अक्सर कर्मचारियों को ‘इनाम‑पैकेज’ की आशा के बजाय व्यक्तिगत जवाबदेही की भावना खोनी पड़ती है।
  • समस्याओं का सक्रिय समाधान: समस्या का इंतजार कर शिकायत के बाद ही हल करना नहीं, बल्कि पहले से ही संभावित अड़चन की पहचान कर कदम उठाना। सार्वजनिक सेवाओं में यह अक्सर ‘परीक्षण‑पर‑हाथ’ की बजाय ‘पूर्व‑निराकरण’ में कमी दिखती है।
  • सतत सीखना: औपचारिक प्रशिक्षण के बाहर भी नई तकनीक और कार्य‑प्रणाली को अपनाना। अधिकांश सरकारी प्रशिक्षण मॉड्यूल अभी‑भी ‘एक‑बार‑का‑सत्र’ बने हुए हैं, जो इन गुप्त आदतों को नहीं सिखाते।
  • सत्ता में रहने वाले प्रशासक इन तालमेलों को पहचानते हुए एक अनौपचारिक घोषणा कर चुके हैं – ‘सॉफ्ट स्किल्स’ को अगली जनशक्ति योजना में शामिल किया जाएगा। परंतु इस प्रकार के वादे पहले भी कई बार सुने गए हैं, जबकि जमीन पर कार्यान्वयन अभी भी धूमिल ही रहता है।

    नागरिक की दृष्टि से, इस नीति‑अव्यवस्था का सीधा असर एक गाँव के आधारभूत विद्यालय में पेंसिल के वितरण में देरी, या एक एटीएम में नक़द आउटेज तक हो सकता है। जब प्रशासन की ‘शांत आदतें’ नहीं अपनाई जातीं, तो सामान्य जनता को फिर से ‘शिकायत‑प्रक्रिया’ में उलझना पड़ता है।

    समाज के तौर पर यह सवाल उठता है कि क्या केवल प्रशिक्षण‑पुस्तकें और अनिवार्य परीक्षण ही पर्याप्त हैं, या कर्मचारियों को वास्तविक कार्यस्थल की ‘छोटे‑छोटे चुनौती’ के साथ संलग्न कर आत्म‑निरीक्षण की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए। जब तक यह बदलाव ‘संविधान की भावना’ के अनुरूप नहीं होगा, तब तक सार्वजनिक सेवाओं में टके रहने वाली अछी तरह से व्यवस्थित बाधाओं को दूर करना मुश्किल रहेगा।

    Published: May 5, 2026