जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: समाज

संसद सदस्य पुरुषों‑और‑लड़कों को नई संदेशी देने के लिए मैनोस्पेयर‑विरोधी सुनवाई दौरे पर

परिचालन के तहत, दो वरिष्ठ संसदीय प्रतिनिधियों ने देश भर में एक सुनवाई दौरा शुरू किया है, जिसका उद्देश्य ऑनलाइन "मैनोस्पेयर" के स्वर को चुप कराना और लड़के‑बच्चों को समानता‑परक दृष्टिकोण देना है। यह पहल, सामाजिक असमानता और लैंगिक हिंसा के बढ़ते आँकड़ों के जवाब में, पीढ़ीगत परिवर्तन की आशा रखती है।

विधायी सदस्य दीनदयाल रेघु ने कहा, "हमारा लक्ष्य केवल मौखिक प्रतिज्ञा नहीं, बल्कि एक ठोस सांस्कृतिक बदलाव है, जिसमें लड़के‑बच्चे समझें कि लिंग समानता किसी प्रतिस्पर्धा का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक समृद्धि का साधन है।" साथ ही, महिला संसदीय नेता गीता केरानी ने जोड़ते हुए उजागर किया, "जब हम पुरुषों को भी इस विमर्श में शामिल करते हैं, तो हम समानता को एक सामूहिक लाभ के रूप में पेश करते हैं, न कि महिलाओं के खिलाफ एक प्रतिस्पर्धा के रूप में।"

भारत में पिछले दशक में डिजिटल मंचों पर महिलाओं के प्रति अपमानजनक और उत्पीड़न‑भरे विचारों की वार्ता तेज हुई है। इस मंच पर अक्सर "मैनोस्पेयर"‑संबंधी विचारधारा को बिना जाँच‑परख के प्रसारित किया जाता है, जिससे युवा वर्ग में रूढ़िवादी दृष्टिकोण पनपते हैं। इस सामाजिक संदर्भ में, इस सुनवाई दौरे का महत्व दो गुना हो जाता है: यह न केवल नीति‑निर्माताओं और नागरिकों के बीच सेतु बनाता है, बल्कि उन असमानता‑भरे विचारों को भी सार्वजनिक तौर पर खारिज करता है, जिनका अभी तक प्रशासनिक प्रतिक्रिया में अक्सर "आधारभूत कारणों को समझना" तक ही सीमित रहा है।

केंद्रीय एवं राज्य स्तर पर कई पहलें चल रही हैं – जैसे कि स्कूली पाठ्यक्रम में लिंग‑सजग शिक्षा, ऑनलाइन हेट‑स्पीच के खिलाफ कड़ी सज़ा, तथा रोजगार में समान अवसर सुनिश्चित करना। परन्तु इन नीतियों की कार्यान्वयन में अक्सर देरी और निरंतरता की कमी देखी जाती है। "हर साल नई योजना बनती है, पर जमीन पर उतारने में देर हो जाती है," इस पर एक सामाजिक कार्यकर्ता ने तंज भरा टिप्पणी किया। यही तंज इस सत्र में भी सुनवाई दौर के प्रतिभागियों ने साझा किया – प्रशासन का लक्ष्य स्पष्ट है, पर उसका गति‑वृत्त कभी‑कभी बिंबहीन प्रतीत होता है।

सुनवाई दौरे के दौरान, प्रतिनिधियों ने शहरी तथा ग्रामीण इलाकों के युवा समूहों से सीधे संवाद किया। छात्रों ने बताया कि लैंगिक विभाजन के बारे में उनकी समझ अक्सर घर के भीतर चल रही बातों से बनती है, जबकि ऑनलाइन मंचों में मिलते नकारात्मक संदेश उनके मन में गहरी छाप छोड़ते हैं। इसे लेकर, प्रतिनिधियों ने स्कूल‑कॉलेज स्तर पर मैनोस्पेयर‑विरोधी कार्यशालाओं का प्रस्ताव रखा और इसे शैक्षणिक बोर्डों के साथ जोड़ने का आग्रह किया।

सम्पूर्ण रूप से, इस अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नीति‑निर्माता केवल शब्दों में नहीं, बल्कि ठोस कदमों में भी प्रतिबद्ध रहें। सार्वजनिक जवाबदेही के प्रश्न अब और अधिक उभरे हैं – क्या सरकार अपनी स्वयं की योजनाओं को समय‑सीमा में लागू कर पाएगी, या यह मौखिक वादे के परदे के पीछे ही रह जाएगा? समय ही तय करेगा कि इस पीढ़ीगत परिवर्तन का वास्तविक प्रभाव कितना गहरा होगा।

Published: May 6, 2026