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Category: समाज

स्वप्नों की ईमानदारी को प्राथमिकता: कोहली की सलाह और स्कूल‑परिवार में मार्गदर्शन की कमी

अभी हाल ही में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सितारे विराट कोहली ने छात्रों के बीच एक सरल लेकिन गहरी बात शेयर की – ‘अपने सपनों के साथ ईमानदार रहें’। उन्होंने बताया कि क्रिकेट के प्रति उनका शुरुआती जुनून भी इसी ईमानदारी से जन्मा था, और इस सिद्धांत को उन्होंने कड़ी मेहनत और निरंतरता से पहले रखा। यह संदेश, हालांकि व्यक्तिगत प्रतिबिंब जैसा लग सकता है, भारत के शैक्षिक ताने‑बाने में कई बड़े प्रश्न उठाता है।

देश की अधिकांश स्कूलों में आज‑कल करियर काउंसलिंग एक बंधन‑भरी वस्तु बन गई है। जहाँ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने ‘व्यक्तिगत लक्ष्य‑उन्मुख शिक्षा’ का हवाला दिया है, वहीं अधिकांश शालाओं में छात्रों के स्वप्नों को समझने‑विकसित करने के लिये प्रशिक्षित सलाहकारों की हाजरी नहीं है। परिणामस्वरूप, कई विद्यार्थियों को स्वयं ही अपनी अभिलाषाओं को परखना पड़ता है, जबकि प्रबंधन अक्सर ‘उच्च अंक’ और ‘परीक्षा‑केंद्रीकृत’ ढांचे में फँसा रहता है।

कोहली ने जहाँ माता‑पिता को अपने बच्चों के वास्तविक अभिलाषाओं को पहचानने की अपील की, वहीं वास्तविकता में अधिकांश घरों में शिक्षा को आय‑सुरक्षा के साधन के रूप में देखा जाता है। विशेषकर ग्रामीण और निम्न‑आय वर्गों में, बच्चा क्या बनना चाहता है, इस प्रश्न से अधिक ‘कौन स्कूल जाता रहेगा’ की चिंता प्रमुख बनी रहती है। यह असमानता सामाजिक सिद्धांतों को तोड़ती है, क्योंकि वैकल्पिक करियर या खेल‑आधारित विकल्पों को अक्सर अभाव‑संकट के रूप में लीक किया जाता है।

प्रशासन की ओर से कई योजनाएं शुरू हुई हैं – जैसे ‘स्कूल में काउंसलिंग किट’, ‘राष्ट्रीय खेल विकास मंच’ आदि। लेकिन उनका कार्यान्वयन अक्सर आदर्श‑परिणाम की बजाय कागज़ी औपचारिकता में ही रह जाता है। मंत्रालयों की बैठकों में यह घोषणा की जाती है कि “सभी दसवीं कक्षा के छात्रों को वार्षिक कैरियर वर्कशॉप का अधिकार मिलेगा”, पर असली ज़मीन में केवल बड़े‑शहरों के चुनिंदा स्कूलों में ही यह प्रचलित है। ऐसी विफलता का व्यंग्य यही है कि जब तक ‘सपना’ शब्द को सार्वजनिक नीति में मुख्य बिंदु नहीं बनाया जाता, तब तक इस प्रकार के प्रेरक संदेश केवल प्रेरणा‑ग्लास के पॉलिश तक सीमित रहेंगे।

विराट कोहली के शब्दों में निहित सच्चाई को सामाजिक रूप में अपनाने के लिये दो स्तर की ज़रूरत है – प्रथम, माता‑पिता और शिक्षकों को बेटों‑बेटियों के वास्तविक आशाओं को सुनने व समझने के लिये प्रशिक्षित करना; द्वितीय, नीति निर्माताओं को इस सुनवाई को प्रशासनिक ढांचे में उत्थापित करना, न कि केवल बड़े‑प्रकाशनों में घुसे। तभी ‘स्वप्नों की ईमानदारी’ सिर्फ एक व्यक्तिगत मंत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा‑समानता की दिशा में एक ठोस कदम बन पाएगी।

Published: May 3, 2026