स्वास्थ्य मंत्रालय में आध्यात्मिक उपचार के नजरिए ने सार्वजनिक स्वास्थ्य को धूल में धकेला
फरवरी 2025 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के नई नियुक्त सचिव ने एक असामान्य संदेश के साथ अपना कार्यकाल शुरू किया। उन्होंने राष्ट्रीय स्वास्थ्य समस्याओं को केवल शारीरिक नहीं, बल्कि "आत्मिक रोग" के रूप में परिभाषित किया, जिसका मूल कारण कहा गया कि वह देश की नैतिक गिरावट और आध्यात्मिक पदक्रम की क्षय है। इस बयान ने न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य के स्थापित सिद्धांतों को चुनौती दी, बल्कि वैज्ञानिक विशेषज्ञों के कार्य को भी ‘दुश्मन’ की श्रेणी में रख दिया।
नए मंत्रालयिक निर्देश में पूजा‑प्रार्थना, मंत्रोच्चार और ‘आत्मिक युद्ध’ को रोगनिवारण के प्रमुख साधन बताया गया। इसके साथ ही कई वरिष्ठ वैद्यकीय विशेषज्ञों, महामारी संशोधकों और संशोधित टीका असुरक्षित मानकर सार्वजनिक मंच से हटाने का आह्वान किया गया। परिणामस्वरूप, कई राज्यों में चल रहे टीकाकरण अभियान में स्थगन आया, और ग्रामीण एवं शहरी स्लम क्षेत्रों में जलजनित रोग एवं एचआईवी संक्रमण की दर में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
इस नीति के प्रतिपक्ष में चिकित्सा कॉलेजों, विज्ञान परिषदों और नागरिक समाज संगठनों ने आवाज़ उठाई। वे तर्क देते हैं कि आध्यात्मिक हस्तक्षेप को सार्वजनिक स्वास्थ्य के आधारभूत सिद्धांतों – सफाई, टीका, पोषण व साक्ष्य‑आधारित उपचार – से प्रतिस्थापित करना न केवल अनजाने में रोगात्मक बोझ बढ़ाता है, बल्कि सामाजिक असमानता को और तेज़ करता है। गरीब एवं दलित वर्ग, जो पहले से ही स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का शिकार हैं, अब उन्हें आध्यात्मिक समाधान के नाम पर संतोष‑जन्य दवाओं और अनौपचारिक प्रथाओं के भरोसे रहना पड़ रहा है।
विपरीत प्रतिक्रिया के बावजूद, मंत्रालय ने इस नीति को ‘राष्ट्रभक्ति’ और ‘आत्मिक पुनरुद्धार’ के मंच पर स्थापित कर, कई राज्य स्वास्थ्य अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे विशेषज्ञों के प्रतिवाद को ‘धार्मिक भावनाओं का विघटन’ के रूप में पेश करें। इस असामान्य प्रशासनिक शैली ने कई उच्चाधिकारियों को अपनी पदावधि समाप्त होने तक मौन रहने के लिए मजबूर किया, जिससे प्रशासनिक जवाबदेही में गंभीर गिरावट आई।
नीति निर्माण में इस आध्यात्मिक घटक की भागीदारी तय कर रही है कि भविष्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य संकुल कितनी सहजता से विज्ञान‑आधारित निर्णयों को प्राथमिकता दे पाएगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि इस धारणात्मक बदलाव को संशोधित नहीं किया गया, तो अगले दो वर्षों में ओपीडी‑दौड़, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में और वृद्धि हो सकती है। इसी बीच, कुछ प्रांतीय स्वास्थ्य गृहों ने ‘वैज्ञानिक समीक्षात्मक समिति’ का गठन कर, मौजूदा दिशा‑निर्देशों की पुनः समीक्षा की माँग की है, परन्तु मंत्रालय के आध्यात्मिक रुख को बदलने की संभावना अभी तक दूर प्रतीत होती है।
Published: May 3, 2026