स्वास्थ्य मंत्री ने एंटी‑डिप्रेशन दवाओं के अत्यधिक प्रयोग को रोकने के लिए नई दिशा-निर्देश जारी किए
भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आज एक व्यापक नीति घोषणा की, जिसका उद्देश्य मानसिक रोगों के इलाज में एंटी‑डिप्रेशन दवाओं के अनियंत्रित उपयोग को घटाना है। यह कदम कई वर्षों से मंत्रालय के स्वास्थ्य सचिव के निरंतर आरोपों के बाद आया, जिनके अनुसार दवा कंपनियों की तेज़ी से प्रचार‑प्रसार और डॉक्टरों के जल्द‑बाजी वाले प्रिस्क्रिप्शन ने रोगियों को अनावश्यक रसायनों के जाल में फँसा दिया है।
नई दिशा‑निर्देशों के तहत, किसी भी एंटी‑डिप्रेशन दवा को लिखवाने से पहले रोगी को न्यूनतम दो साक्ष्य‑आधारित मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन से गुजरना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके अलावा, चिकित्सकों को दवा लिखने के साथ‑साथ कम से कम एक सत्र मनो‑परामर्श या संज्ञानात्मक‑व्यवहारिक थेरेपी (CBT) की सलाह देना होगा, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों या निजी क्लिनिकों में उपलब्ध होगी।
इस नीति के तहत केंद्रीय ड्रग कंट्रोल एजेंसी (CDSCO) को दवा कंपनियों को अतिरिक्त लेबलिंग निर्देश जारी करने का आदेश दिया गया है, जिसमें संभावित दुष्प्रभावों, निर्भरता जोखिम और वैकल्पिक उपचारों की जानकारी स्पष्ट रूप से बताई जाएगी। साथ ही, राष्ट्रीय रोगी सुरक्षा बोर्ड को बतौर निरीक्षक नियुक्त किया गया है, ताकि राज्य‑स्तरीय स्वास्थ्य विभागों द्वारा प्रिस्क्रिप्शन डेटा का नियमित ऑडिट सुनिश्चित हो सके।
राज्य सरकारों को भी समान रूप से लागू करने की अपेक्षा है। कुछ राज्यों ने पहले से ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेष बजट आवंटित किया है, परंतु इस नई नीति को लेकर असंतोष भी स्पष्ट है। कई डॉक्टर संघों ने बताया कि “परामर्शीय उपचार के लिए मानकीकृत बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस कदम से रोगी का बोझ तो बढ़ेगा, परंतु डॉक्टर का कार्यभार नहीं घटेगा।”
वास्तविकता यह है कि भारत में लगभग 15 करोड़ लोग विभिन्न स्तरों पर डिप्रेशन का सामना कर रहे हैं, जबकि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच केवल 0.5 % ही है। इस असंतुलन को देखते हुए, स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, “हम दवा पर निर्भरता को कम करके रोगियों को सच्ची मनो‑स्वास्थ्य देखभाल की ओर ले जाना चाहते हैं। यह केवल दवा नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य‑परिदृश्य का पुनर्रचना है।”
नीति के आलोचक यह तर्क देते हैं कि बिना पर्याप्त मनो‑परामर्शीय साधनों के दवा‑निर्देश लागू करना केवल कागज पर ही रहेगा, और “सरकार की कागजी कार्रवाई में तेज़ी होते‑होते अब भी वही पुरानी देरी है।” प्रशासनिक प्रतिक्रिया ने तुरंत ही “नज़र रखी जाएगी” का आश्वासन दिया, परंतु कई मामलों में योजना‑से‑कार्यान्वयन अंतर को लेकर विफलता की कहानी जारी है।
समाज के विभिन्न वर्गों पर इस नीति के प्रभाव को देखना बाकी है। रोगियों को उम्मीद है कि दवा‑निर्भरता घटेगी और उनका दीर्घकालिक स्वास्थ्य बेहतर होगा, जबकि चिकित्सकों को आशा है कि नीति‑निर्धारण में वास्तविक संसाधन अभाव के बारे में अधिक पारदर्शिता आएगी। इस बीच, स्वास्थ्य मंत्रालय ने अगले वर्ष के अंत तक सभी सार्वजनिक अस्पतालों में मानकीकृत मनो‑परामर्शी इकाइयों की स्थापना का लक्ष्य रखा है—एक लक्ष्य जो कागज़ी बोझ में स्माइल इमोजी जोड़ने के बराबर कठिनाई नहीं, बल्कि बुनियादी ढाँचे की ठोस जरूरत है।
Published: May 5, 2026