स्वास्थ्य के लाल संकेत: डॉक्टर पुनम की चेतावनी और व्यवस्था की चूक
डॉ. पुनम ने हाल ही में एक सार्वजनिक चर्चा में उन प्रमुख स्वास्थ्य‑लाल संकेतों पर प्रकाश डाला, जो अक्सर रोग की शुरुआती चेतावनी देते हैं। ये संकेत—अचानक वजन घटना, लगातार थकान, अनपेक्षित रक्तस्राव, या लम्बे समय तक चलने वाली चोटों का ठीक न हो पाना—सामान्य जनता में पर्याप्त रूप से पहचाने नहीं जाते।
भारत में स्वास्थ्य चेतावनियों की अनदेखी अक्सर सामाजिक असमानता और प्रशासनिक लापरवाही के संगम से उत्पन्न होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य‑साक्षरता की कमी, अभ्यस्त डॉक्टर‑परामर्श की दूरी, तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्त पहुंच इन चेतावनियों को “अनदेखा” बना देती है। शहरी मध्यम वर्ग के लोगों को भी कभी‑कभी लक्षणों को हल्के में लेना पड़ता है, क्योंकि रोग की प्रारंभिक पहचान पर केंद्रित राष्ट्रीय अभियान अभी भी ठहराव में हैं।
डॉ. पुनम ने कहा कि यदि इन लाल संकेतों को समय पर पहचाना जाता, तो कई अप्रत्यक्ष मृत्यु और गंभीर रोगों को रोका जा सकता था। उन्होंने बताया कि वर्तमान में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत जागरूकता अभियानों की कार्यवाही धीमी है, जबकि निजी स्वास्थ्य‑सेवा प्रदाताओं पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। यह असंतुलन न केवल रोगी की आर्थिक बोझ बढ़ाता है, बल्कि सामाजिक असमानताओं को और गहरा करता है।
सरकारी स्तर पर हाल के बीटेनर्स-सीआइएएस (बेसिक हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर) के जमीनी उपायों में काफी कमी है। कई राज्य में स्वास्थ्य केन्द्रों में आवश्यक उपकरणों की कमी, प्रशिक्षणहीन नर्सें, और रिपोर्टिंग सिस्टम की अक्षमता ने उन “लाल संकेतों” को समय पर पकड़ने में बाधा डाली है। यही वह कारण है कि अक्सर रोग का पता तभी चलता है जब वह उन्नत अवस्था में पहुँच जाता है, जिससे इलाज की लागत भी काफ़ी बढ़ जाती है।
डॉ. पुनम ने पुनः आग्रह किया कि स्वास्थ्य‑लाल संकेतों की सार्वजनिक सूची को राष्ट्रीय विज्ञापन, स्कूल‑पाठ्यक्रम, तथा ग्रामीण स्वास्थ्य शिविरों में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। साथ ही, डिजिटल स्वास्थ्य‑प्लेटफ़ॉर्म पर सरल चेक‑लिस्ट उपलब्ध कराना चाहिए, जिससे नागरिक स्वयं प्रारंभिक जांच कर सकें। ऐसी नीति‑परिवर्तन की कमी का मज़ाकिया अंदाज़ में उल्लेख करते हुए कहा गया, “हमारी सिस्टम को ‘रोकथाम’ के बजाय ‘रोक’ में अधिक रुचि है।”
समाज को इस बात का बोध होना आवश्यक है कि स्वास्थ्य चेतावनी संकेतों को नज़रअंदाज़ करने का नतीजा केवल व्यक्तिगत रोगियों की नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की भारी लागत और सामाजिक असमानता में वृद्धि है। इस दिशा में तत्काल नीति‑निर्माताओं, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, एवं नागरिकों की भागीदारी आवश्यक है, ताकि भविष्य में “लाल संकेत” को ‘सिर्फ़ चेतावनी’ ही नहीं, बल्कि ‘रोकथाम’ का पहला कदम बनाया जा सके।
Published: May 5, 2026