सेब की लाली‑हरियाली और भारत की पोषण नीति: लाल या हरा, कौन‑सी रणनीति फलदायी?
भारत में सेब को अक्सर मिठाई‑सजावट या स्नैक के रूप में देखा जाता है, परंतु इसके दो प्रमुख रंग‑वेरिएंट – लाल और हरा – स्वास्थ्य‑उपयोग के संदर्भ में अलग‑अलग पहलू पेश करते हैं। लाल सेब में मध्यम ऊर्जा और एंटी‑ऑक्सिडेंट का स्तर अधिक पाया जाता है, जबकि हरे सेब में मौसमी शर्करा नियंत्रण और पाचन‑सुधार के गुण प्रमुख हैं। यह वैज्ञानिक अंतर नीति निर्माताओं और आम नागरिक दोनों के लिये एक गंभीर प्रश्न उठाता है: क्या मौजूदा पोषण योजनाएँ इन विभिन्नताओं को समझती‑समझती हैं?
केंद्रीय सरकार की महात्मा गांधी राष्ट्रीय भोजन योजना (MGNREGA‑भोजन) और शिशु पोषण कार्यक्रम में फल‑संकुल का प्रतिशत घटते बजट के चलते घटता जा रहा है। अक्सर स्कूल‑कैंटीन में सेब, चाहे लाल हो या हरा, मात्र एक पैसे की वस्तु बन कर रह जाता है। इसका सीधा असर कमजोर आर्थिक वर्गों पर पड़ता है, जो लागत‑पर‑प्रभावशीलता को लेकर हरे सेब की ओर झुकते हैं, जबकि उन्हें पोषक‑संतुलन के लिए अधिक लाल सेब की आवश्यकता भी हो सकती है।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2024 में पोषण दिशानिर्देश जारी किए थे, जिसमें फल‑सेवनों के लिए “विविधता” को अहम कहा गया था, परन्तु वैकल्पिक रंग‑वेरिएंट की स्पष्ट अनुशंसा नहीं की गई। इस संकोच ने कई राज्य‑आधारित प्रोग्रामों को निरंतर उलझन में डाल दिया है। कुछ राज्यों ने स्थानीय बाजार की मौसमी उपलब्धता के आधार पर लाल‑सेब को प्राथमिकता दी, जबकि अन्य में हरे‑सेब को ‘डायबिटीज‑फ्रेंडली’ कहा गया – पर आँकड़े या परीक्षण रिपोर्ट नहीं दिखाते।
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लाल‑सेब में flavonoids की मात्रा अधिक होने से दीर्घ अवधि में हृदय रोग‑जोखिम घटता है, जबकि हरे‑सेब के पेक्टिन‑समृद्ध फाइबर से रक्त‑शर्करा नियंत्रण में मदद मिलती है। इस अंतर को नज़रअंदाज़ करना, विशेषकर ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में जहाँ डायबिटीज़ का जोखिम बढ़ रहा है, नीतिगत लापरवाही का संकेत बनता है।
व्यवस्थापकीय असफलता को केवल “सूचना की कमी” नहीं कहा जा सकता। कई राज्यों की कृषि विभागें अभी भी ‘सेब‑विकास’ के लिये कॉफी‑ट्रांसप्लांट लगाती हैं, जबकि उपभोक्ता‑आधारित अनुसंधान पर खर्च नहीं करतीं। परिणामस्वरूप, हरे‑सेब की कीमत अक्सर लाल‑सेब से दो‑तीन गुना अधिक रहती है, जिससे मध्यम वर्ग के बच्चों को स्वास्थ्य‑विकल्पों से वंचित होना पड़ता है।
वर्तमान में, फल‑आधारित सार्वजनिक वितरण योजना में सुधार की माँगें लगातार बढ़ रही हैं। नागरिक समाज संगठनों ने पृष्ठभूमि में “सेब‑समता” अभियान शुरू किया है, जो विभिन्न रंग‑सेब के पोषण‑लाभों को समान रूप से उपलब्ध कराने की माँग करता है। जब तक नीति निर्माता औषधीय अंतर को मात्र “फ़ैशन” नहीं समझते, तब तक यह असमानता रहेगी।
समापन में कहा जा सकता है कि लाल‑हरिया सेब दोनों ही भारत के स्वास्थ्य‑लक्ष्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं – बशर्ते सरकार इन्हें ‘विकल्प‑संतुलन’ के रूप में मान्यता दे, मूल्य‑नीति को यथार्थ बनाये, और जनता को स्पष्ट, वैज्ञानिक‑आधारित जानकारी प्रदान करे। तभी इस फल‑विविधता के सामाजिक‑स्वास्थ्य लाभ पूरे देश में फले‑फूले।
Published: May 3, 2026