संतुलन विकारों के बढ़ते मामले पर सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली की चुप्पी
दुर्भाग्यवश, उम्र बढ़ने और जीवनशैली में बदलाव के साथ ही भारत में संतुलन संबंधी समस्याएँ भी बढ़ रही हैं। गिरने की घटनाओं से दुर्घटनाएँ, अस्पताल में दाखिले और आर्थिक बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है, पर सरकार की प्रतिक्रिया अभी तक शून्य के करीब दिखती है।
शहरों में निजी क्लिनिकों में कार्यरत फिजियोथेरेपिस्ट और वैस्टिबुलर रीहैबिलिटेशन विशेषज्ञ मैगी स्टैसी जैसी पेशेवरों से मिलते‑जुलते केसों में बताया गया है कि नियमित संतुलन‑व्यायाम, आँख‑सिर‑कान का समन्वय और मेडिकेशन–थेरपी के मिश्रण से रोगियों को महत्त्वपूर्ण राहत मिलती है। परन्तु इन सेवाओं का भू‑पंखे में केवल शहर के शहरी वर्ग को ही फायदा मिल रहा है।
ग्रामीण भारत में इस‑धरने की देखभाल की नज़रिए से अक्सर स्वभाविक तौर पर नजरअंदाज किया जाता है। वैस्टिबुलर रीहैबिलिटेशन के विशेष केंद्रों की कमी, प्रशिक्षित पेशेवरों की घटती संख्या और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में इसका अभाव स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि नीति‑निर्माताओं ने इस मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दी। "जब तक प्रधानमंत्री को अपनी कुर्सी पर संतुलन नहीं बिगड़ता, तब तक इस मुद्दे को प्राथमिकता नहीं मिल पाती" – यह चुप‑चाप व्यंग्य न केवल असंतोष को दर्शाता है, बल्कि मौजूदा प्रशासनिक उदासीनता की गहरी पीड़ भी उजागर करता है।
वर्तमान में, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में वैस्टिबुलर रीहैबिलिटेशन को विशेष रूप से शामिल नहीं किया गया है। इससे न केवल रोगियों की जीवन‑गुणवत्ता घटती है, बल्कि सामाजिक असमानता भी बढ़ती है—एक ओर शहर के धनी वर्ग निजी क्लिनिक में उपचार कर रहे हैं, वहीँ ग्रामीण क्षेत्र के लोग चोट‑के‑बाद घर में बेहोशी से जूझते रहते हैं।
समाधान के रूप में विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एंटी‑ड्रॉप प्रोग्राम, संतुलन‑व्यायाम सत्र और सामुदायिक जागरूकता अभियानों को शामिल किया जाए। साथ ही, फिजियोथेरेपी एवं ऑडियो-लॉजिस्ट शिक्षा के लिए विशेष कोर्स लॉन्च करके पेशेवरों की आपूर्ति बढ़ायी जा सकती है। प्रशासनिक पहल के बिना यह समस्या केवल बढ़ती ही रहेगी, और सार्वजनिक स्वास्थ्य में बढ़ती असमानताओं को और गहरा कर देगी।
Published: May 4, 2026