सैंडर पीचाई की पुस्तक‑सिफ़ारिश ने भारत में शैक्षणिक असमानता की नई लकीर खींची
गूगल के सीईओ सैंडर पीचाई ने हाल ही में स्मार्ट थिंकिंग के लिए छः पुस्तकों की सूची प्रस्तुत की। यह सूची, जो विश्व स्तर पर तकनीकी और नेतृत्व के पाठ्यक्रम में सराही जाती है, भारत के शैक्षणिक ढाँचे में किस हद तक प्रतिध्वनि पाएगी, यह प्रश्न अभी उठ रहा है।
पहला सवाल यह है कि इन पुस्तकों की पहुँच आम भारतीय छात्र‑छात्राओं तक कैसे पहुँचेगी। देश के कई ग्रामीण जिलों में सार्वजनिक पुस्तकालयों की दशा अभी भी ‘डिज़ाइन‑ऑफ़‑डिज़ाइन’ जैसी है; जहाँ तक डिजिटल कनेक्टिविटी भी अक्सर ‘स्लो‑फ़ायर’ मोड में काम करती है। ऐसी परिस्थितियों में जब सुदूर शहरी अभ्यर्थी आसानी से ई‑बुक्स और ऑडियो‑कंटेंट तक पहुँच सकते हैं, तो किनकी ‘स्मार्ट थिंकिंग’ की राह में बाधा नहीं बनेगी?
दूसरे, नीतिगत दायरा इस बात में निहित है कि क्या सरकार केवल निजी उभरते सितारों की सिफ़ारिशों को अपनाकर अपनी शैक्षिक रणनीति तैयार करेगी। कई बार देखी गई प्रशासनिक लापरवाही की परिपत्रा वही है: मौजूदा पाठ्यक्रम में ‘नवाचार’ शब्द को जोड़ कर, बुनियादी बुनियाद को अनदेखा कर देना। ऐसे में शिक्षा‑मंत्री के कार्यालय में “ध्यान दें: पीचाई की पाँच‑पुस्तकें” जैसा नोटिस एक हफ्ते में ही ‘भुला दिया’ जाने की संभावना अधिक है।
तीसरा, सामाजिक असमानता का तत्व यहाँ और भी गहरा है। यदि ये पुस्तकें, जो अक्सर तकनीकी उद्यमिता और डिजिटल साक्षरता पर केंद्रित हैं, सार्वजनिक स्कूलों में लागू नहीं हो पाईं, तो वे केवल अभिजात्य वर्ग के ‘सम्पन्न विचारक’ को ही लाभ पहुँचा पाएँगी। इस बात का लंगर यह दिखाता है कि नीति‑निर्माता अक्सर ‘जेनरलिस्ट‑एंड‑स्पेसिफिक’ के बीच संतुलन नहीं बना पाते।
चौथे, प्रशासनिक कार्यान्वयन की विफलता पर एक नज़र डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कई राज्य‑स्तर के शिक्षा बोर्ड अभी भी काग़ज़ी मंज़ूरी में फँसे हुए हैं। इन बोर्डों में तकनीकी विशेषज्ञों की कमी, और साथ ही विभिन्न सरकारी विभागों के बीच ‘इंटर‑डिपार्टमेंटल‑डिस्कोर्ड’ की लत, इस बात को और भी जटिल बनाती है कि किसे किस पुस्तक को पढ़ने की सलाह देना चाहिए।
इन सबके बीच, एक सैद्धांतिक समाधान रोशन हो सकता है: राष्ट्रीय स्तर पर ‘पुस्तक‑सुलभता’ अभियान, जो न केवल सार्वजनिक लाइब्रेरी के बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करे, बल्कि डिजिटल एंटी‑सिंपली फॉर्मेट को सभी छात्रों के लिए मुफ़्त में उपलब्ध कराये। साथ ही, नीति‑निर्माताओं को निजी‑सिफ़ारिशों को ‘अधिसर्वत्र’ मानकर शैक्षिक पैमाने पर अनिवार्य बनाने की बजाय, एक बहु‑स्तरीय मूल्यांकन प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
सारांश में, सैंडर पीचाई की पुस्तक‑सिफ़ारिश ने एक पहलू उजागर किया है—कि वैश्विक विचारधारा को भारत की मौजूदा सामाजिक‑शिक्षात्मक वास्तविकता के साथ समाहित करना सिर्फ शब्दों का खेल नहीं, बल्कि एक गहरी प्रशासनिक चुनौती है। यदि इस चुनौती को निरस्त करने के लिए आवश्यक बुनियादी कदम नहीं उठाए गए, तो ‘स्मार्ट थिंकिंग’ मात्र एक बाज़ार‑उत्पाद बना रहेगा, न कि राष्ट्रीय स्तर पर ज्ञान‑सशक्तिकरण की राह।
Published: May 3, 2026