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Category: समाज

सिंगापुर के स्कूलों में कानिंग: अंतिम उपाय के रूप में नई नीति और बुलेरिंग पर कड़ा कदम

सिंगापुर के शिक्षा मंत्री डेस्मंड ली ने कल एक आधिकारिक सभा में कहा कि स्कूलों में कानिंग अब "अंतिम उपाय" के रूप में ही लागू की जाएगी। इस नीति को सख्त मानकों के आधार पर नियमन किया गया है, जहां यह केवल लड़कों पर, और केवल उन मामलों में लागू होगी जिनमें गंभीर अनुशासनात्मक लापरवाही या हिंसा शामिल हो।

कानिंग के अलावा, मंत्रालय ने प्रतिबंधात्मक उपायों को दो-तीन और विस्तारित किया है: लगातार अनियमितता पर डिटेंशन, और पुनरावृत्ति करते हुए छात्रों को अस्थायी निलंबन का प्रावधान किया गया है। इन उपायों का उद्देश्य स्पष्ट सीमाएँ स्थापित कर सुरक्षित शैक्षिक माहौल बनाना है—कुल मिलाकर, "अधिकतर छात्रों को सीखने का अधिकार और शिष्टाचार का आदान‑प्रदान".

नयी नीति के साथ, साइबरबुलीइंग के शिकार छात्रों के लिए सहायता प्रणालियों को भी सुदृढ़ किया गया है। विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के लिए अतिरिक्त परामर्श और सुरक्षा उपायों की घोषणा की गई, ताकि तकनीकी युग के नए डर का सामना किया जा सके।

भारत में इस प्रकार की नीति पर चर्चा लम्बी से चल रही है। कई राज्यों में अभी भी शारीरिक दंड को ‘कानूनी’ या ‘परम्परागत’ माना जाता है, जबकि राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग ने लगातार इसे ‘हिंसा’ के रूप में वर्गीकृत करने की वकालत की है। सिंगापुर का दायित्व‑आधारित मॉडल, जहाँ कानिंग केवल गंभीर उल्लंघनों के लिए, ‘अंतिम उपाय’ के रूप में सीमित है, भारतीय शिक्षकों और नीति-निर्माताओं के लिए एक तुलनात्मक बिंदु प्रस्तुत करता है।

व्यंग्य के बिना कहा जाए तो, जहाँ एक छोटा‑सा द्वीप “शिक्षा को अनुशासन” के साथ जोड़ता है, वहीँ भारत के कई जिलों में अनुशासन नीतियों की ‘रोकथाम’ तंत्र को कागज़ी कार्यवाही तक सीमित छोड़ दिया गया है। इसका प्रत्यक्ष असर छात्रों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक प्रगति पर पड़ता है—एक ऐसी समस्या जो सार्वजनिक जवाबदेही के सवाल को उजागर करती है।

प्रशासनिक सिद्धांत के अनुसार, किसी भी नीतिगत कदम की सफलता इसका ‘कार्यान्वयन’ है, न कि सिर्फ़ घोषणा। सिंगापुर के मामले में, स्पष्ट मानक, निगरानी तंत्र और समग्र समर्थन प्रणाली का ज़िक्र है। भारत में भी यदि समान‑समान प्रयास किए जाएँ—जैसे कि डिजिटल बुलीइंग के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन, विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के लिए सशक्त समर्थन नेटवर्क, तथा अनुशासन के ‘अंतिम उपाय’ को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने वाले नियम—तो शैक्षिक माहौल में वास्तविक परिवर्तन अपेक्षित हो सकता है।

भले ही सिंगापुर ने कानिंग को ‘अंतिम उपाय’ कहा हो, पर इस कदम से यह प्रश्न उठता है कि क्या शारीरिक दंड बिना सामाजिक‑सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कार्य कर सकता है? क्या यह छात्र-शिक्षक के बीच भरोसे को नष्ट कर देगा? यहाँ से निकली सीख यह है कि कोई भी नीति तब तक सिद्ध नहीं मानी जाएगी जब तक वह बच्चों के मौलिक अधिकारों, शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता न दे।

सिंगापुर के इस कदम से यह स्पष्ट होता है कि बुलेरिंग को रोकना केवल ‘न्यायिक’ या ‘शिक्षात्मक’ उपायों तक सीमित नहीं है; यह एक समग्र सामाजिक परिवर्तन की बात है, जिसमें नीतियों की दृढ़ता, संस्थागत जवाबदेही और जनता की जागरूकता का सहयोग आवश्यक है। भारत के शैक्षिक मंच पर भी इस प्रकार की बहु‑आयामी रणनीति अपनाना, अंततः ‘सुरक्षित स्कूल’ के दीर्घकालिक लक्ष्य को साकार कर सकता है।

Published: May 5, 2026