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स्कूल की वर्दी में बच्चा, पिता की गाड़ी खींचे तपती धूप में – विशेषाधिकारियों को सीखनी चाहिए ये बातें
एक छोटी लेकिन मार्मिक वीडियो ने सोशल मीडिया पर चर्चा का रोड़ा खड़ा कर दिया। स्कूल की साफ़ सफ़ेद वर्दी में सजे एक नौजवान छात्र ने, लगभग दो डिग्री सैंटीग्रेड से भी ज्यादा तापमान वाले सत्र में, अपने पिता की हाथी-घोड़े की गाड़ी को खींचते हुए देखा। इस साधारण श्रम कार्य को देखते ही कई लोगों ने भावुकता के साथ-साथ सवालों का सैलाब शुरू कर दिया।
बच्चे की पहल को केवल एक व्यक्तिगत भलाई के रूप में नहीं, बल्कि भारत में मौजूदा सामाजिक विषमता की एक झलक के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। एक ओर जहाँ लाखों बच्चों को शिक्षा के अधिकार के साथ स्कूल की बेंच से दूर ले जाया जाता है, वहीं दूसरी ओर अनगिनत परिवारों को जीवनयापन के लिए अनौपचारिक क्षेत्र में कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। इस कड़ी गर्मी में, जहाँ प्रतिदिन 40 °C से अधिक तापमान की चेतावनी जारी रहती है, ऐसे कार्यों में स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाता है—जैसे हाइपर्टेमिया, डिहाइड्रेशन और काम से जुड़ी चोटें।
शिक्षा विभाग की ओर से अक्सर कहा जाता है कि स्कूल इन बच्चों को ‘समग्र विकास’ के पथ पर ले जाने में सहयोग करेंगे, पर वास्तविकता में कई स्कूलों में पर्याप्त छायादार जगह, पर्याप्त जल सुविधाएँ और गर्मी-सम्बन्धी स्वास्थ्य देखभाल की व्यवस्था नहीं होती। इसी तरह, स्थानीय प्रशासन की ‘व्यापक योजना’ की उपाख्यानें अक्सर कागज़ों तक ही सीमित रह जाती हैं, जबकि जमीन पर उन दूरदराज़ क्षेत्रों में जहाँ छोटे धंधे चलते हैं, कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता। बचाव के नाम पर स्थापित ‘स्वच्छता अभियान’ और ‘जल संरक्षण योजना’ के तहत भी अक्सर यह बात छुपी रहती है कि ठंडे पानी के नल या शेड नहीं हैं जहाँ कामगार थक कर आराम कर सकें।
वीडियो में दिखाया गया इस तरह का सहयोग बहुचर्चित है, पर इसका निहित संदेश व्यापक नीति‑निर्माण में भी अभिव्यक्त होना चाहिए। इस परिश्रम पर आधारित सामाजिक मूल्यों को सुदृढ़ करने के लिए, सरकार को चाहिए कि वह अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के लिए वैधानिक सुरक्षा उपाय लागू करे, जैसे गर्मी‑से‑सुरक्षित कार्य घंटे, पोषण‑आधारित भोजन योजनाएँ और नियमित स्वास्थ्य जांच। इस बीच, शिक्षा संस्थानों को चाहिए कि वे छात्रों को ‘परिवार की सहायता’ के साथ-साथ ‘व्यक्तिगत अधिकारों’ की भी शिक्षा दें, ताकि बचपन में ही सामाजिक जिम्मेदारी और व्यक्तिगत स्वायत्तता का संतुलन बना रहे।
इस साधारण act ने privileged बच्चों पर एक नज़र डालने को कहा है—कि पढ़ाई का नाम ले कर भी, दूर-दराज़ के गाँवों में की जा रही परिश्रम की कदर करना उनके लिए उतना ही आवश्यक है, जितना आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश करना। यदि प्रशासन इस लहर को केवल सोशल मीडिया के ट्रेंड के रूप में देखते रहेंगे, तो यह छोटा सा पहल एक और भी बड़े सवाल को जन्म देगा: ‘जब दर्जनों बच्चे समान हालात में धीरे‑धीरे बर्नआउट हो रहे हैं, तो क्या हम उन्हें ‘छोटे एंथेनी’ कह कर सराहते रहेंगे?’
Published: May 7, 2026