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Category: समाज

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‘साइलेंट फ़्रेंड’ फिल्म से पर्यावरणीय जागरूकता का नया आह्वान, लेकिन नीति‑कार्यान्वयन में सरकारी झुकाव पर सवाल

‘साइलेंट फ़्रेंड’ एक कला‑संपन्न फिल्म है जो एक ही पेड़ को केंद्र बिंदु बनाकर तीन अलग‑अलग दशकों की जीवन गाथा सुनाती है। इस कथा के माध्यम से दर्शकों को प्रकृति की सुदृढ़ता, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और सामाजिक संरचनाओं में पेड़ों के अभिन्न योगदान के बारे में सोचने को प्रेरित किया जाता है।

फिल्म का निर्माण कलाकारों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के सहयोग से हुआ, लेकिन इसके व्यापक प्रकाशन एवं सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए मिलने वाला सरकारी समर्थन सीमित रहा। कई जिलों में सार्वजनिक सभागारों में इस प्रकार के चित्रण को दिखाने के लिए आवश्यक बजट को ‘वैकल्पिक’ कर दिया गया, जबकि वही बजट अक्सर औद्योगिक विकास के नाम पर वृक्षारोपण के स्थान पर बुनियादी ढांचे में लगाया जाता रहा है।

शिक्षा क्षेत्र में इस फिल्म के उपयोग की संभावनाएँ उजागर हैं—स्कूल‑कक्ष में प्राकृतिक शिक्षा के रूप में इसे दिखाया जा सकता था, पर शैक्षणिक कार्यक्रमों में इसे सम्मिलित करने की दिशा में कोई लक्षित नीति नहीं बनायी गयी। परिणामस्वरूप, शहरी बच्चों को उनके जीवित वातावरण से जुड़ी वास्तविक समस्याओं का थेट अनुभव नहीं मिल पाता, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में पेड़ के महत्व से जुड़ी आर्थिक असमानताएँ बढ़ती रहती हैं।

स्वास्थ्य दृष्टिकोण से देखा जाए तो पेड़ शहरी धुएँ को कम करने, श्वसन रोगों को घटाने और मानसिक कल्याण को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाते हैं। ‘साइलेंट फ़्रेंड’ इस बात को कला के माध्यम से स्पष्ट करता है, पर सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में हरे‑भरे स्पेस की कमी को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

यहाँ तक कि फिल्म के प्रदर्शन के लिए आवश्यक सार्वजनिक स्थानों का प्रावधान भी असमानता से ग्रस्त है। राजधानी के कई हिस्सों में अच्छी तरह से सुसज्जित सांस्कृतिक हॉल उपलब्ध हैं, जबकि छोटे कस्बों में ऐसी सुविधाओं की कमी है, जहाँ यह कथा स्थानीय लोगों के बीच पर्यावरणीय संवेदनशीलता को जगाने में सबसे अधिक सक्षम होती।

वर्तमान में, फिल्म का वितरण मुख्यतः निजी मंचों एवं ऑनलाइन स्ट्रीमिंग तक सीमित है, जिससे वह समाज के बड़े वर्ग तक नहीं पहुँच पाती। यह स्थिति दर्शाती है कि पर्यावरणीय चेतना को बढ़ावा देने वाली सांस्कृतिक सामग्री के लिए सरकारी फंडिंग और नीति‑निर्धारण में अभी भी गहरी खामियां बनी हुई हैं।

‘साइलेंट फ़्रेंड’ केवल एक कलात्मक कृति नहीं, बल्कि नीति परिवर्तकों के लिए एक चुनौती है: क्या प्रशासनिक तौर पर प्रकृति संरक्षण को आर्थिक विकास के साथ संतुलित करने के लिये पर्याप्त कदम उठाएगा, या कला‑परिचालन को फिर भी ‘वैकल्पिक’ ही माना जायेगा? जनता, विशेषज्ञ और कलाकारों के इस प्रश्न पर तेज़ी से प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता है, क्योंकि पेड़ के बिना समाज का भविष्य अत्यंत असुरक्षित हो सकता है।

Published: May 8, 2026