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Category: समाज

साइकेडेलिक दवाओं को वैधता: नई नीति में बदलाव ने उजागर की प्रशासनिक अनिश्चितता

कई वर्षों से भारत में नशे की लत और मनोवैज्ञानिक रोगों से लड़ते‑जुड़ते, सरकारी स्वास्थ्य विभाग ने अब एक असामान्य मोड़ लिया है। पिछले दो दशकों में ‘साइकेडेलिक’ शब्द ही ‘अवैध’ की छटा बिखेरता रहा, परन्तु हाल ही में केंद्र सरकार ने मान्यताओं की दीवारें तोड़कर, प्सिलोसाइबिन और एलएसडी‑आधारित उपचारों को नियंत्रित प्रयोगशालाओं में वैध करने की नीति तैयार की है।

यह परिवर्तन कई सामाजिक परतों को प्रभावित करता है। पहली ओर, मानसिक स्वास्थ्य से जूझते लाखों रोगियों को वैज्ञानिक‑समर्थित उपचारों का नया विकल्प मिल रहा है। दूसरी ओर, सीमित संसाधनों वाले ग्रामीण तथा सक्रिया वर्ग के लोगों के लिए इस नई सुविधा तक पहुँच अभी भी सवालों के घेरे में है।

पृष्ठभूमि में निहित है पिछले वर्ष की मनोवैज्ञानिक रोग अनुगमन रिपोर्ट, जिसमें बताया गया कि भारत में अवसाद तथा तनाव‑संबंधी विकारों की दर में 35 % की वृद्धि देखी गई। इस आँकड़े ने नीति निर्माताओं को ‘वैकल्पिक उपचार’ की तलाश में विवश किया। पारम्परिक दवाओं के दुष्परिणामों तथा स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की झिल्ली‑झिल्ली भरी पहुँच को देखते हुए, विशेषज्ञों ने साइकेडेलिक दवाओं के संभावित लाभों पर प्रकाश डाला।

सरकार ने इस दिशा में कदम उठाते हुए, ‘नशा नियंत्रण (संशोधन) अधिनियम’ में विशेष संशोधन प्रस्तावित किया, जिससे प्सिलोसाइबिन‑आधारित दवाओं को केवल लाइसेंस‑प्राप्त शोध संस्थानों में प्रयोग किया जा सके। हालांकि, इस बदलाव के साथ कई प्रश्न भी उठे हैं।

इन चिंताओं को देखते हुए, प्रशासनिक प्रतिक्रियाएँ मिश्रित रही हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि “नियमित निगरानी और कड़ी लाइसेंसिंग प्रक्रिया से दुरुपयोग के जोखिम को न्यूनतम किया जाएगा”। वहीं, विपक्षी दलों ने इसे “राजनीतिक दिखावा” कहकर आलोचना की, क्योंकि अभी तक इस प्रयोगात्मक चरण के लिए पर्याप्त बजट या कार्यशाली ढांचा नहीं बन पाया है।

व्यंग्य यह है कि, पिछले दशकों में नशा‑मुक्ति अभियानों में दिखाए गए ‘सख्त’ रुख को अब ‘वैज्ञानिक’ रंग में ढाला गया है, परन्तु वही ब्यूरेक्रेटिक रुकावटें अभी भी नई नीतियों को जमीन से उड़ाने में सक्षम दिखती हैं। यदि प्रशासन इन पहलुओं को ध्यान में रखे बिना सिर्फ़ ‘नीति बदल-कर दिखा दिया’ के मोड में रहेगा, तो जनता का विश्वास वाकई धूमिल हो सकता है।

समग्र रूप से, यह नीति परिवर्तन भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य परिदृश्य में एक ‘लंबी, अजीब यात्रा’ के समान प्रतीत होता है। यदि सही दिशा‑निर्देश, पारदर्शी निगरानी और न्यायसंगत पहुँच सुनिश्चित की जाए, तो साइकेडेलिक थेरेपी न सिर्फ़ मानसिक रोगियों के लिए आशा की किरण बन सकती है, बल्कि नीति‑निर्माण में विज्ञान‑आधारित सोच का मुकाम भी स्थापित कर सकती है। अन्यथा, यह महज एक और ‘प्रसाद‑पर्यंत‑पहुंचना’ की कहानी बन कर रह जाएगी।

Published: May 3, 2026