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शहर में फलों के छिलके को देसी उर्वरक बनाकर कचरे पर नियंत्रण, प्रशासन की चुप्पी
भारत के कई महानगरों में रोज़ाना निकालते‑निकलते किचन के अवशेष, विशेषकर फलों के छिलके, कचरे के ढेरों में बिखरते जाते हैं। जबकि वही छिलके घर के बगीचे, बालकनी की टमाटर की रोपाई या टैरेस के जड़ी‑बूटी बिस्तर में प्राकृतिक उर्वरक बन सकते हैं। यह सरल तकनीक न केवल रासायनिक उर्वरकों पर खर्च घटाती है, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य को भी सुधारती है—पर क्या यह बात नगर निकायों की मीटिंग एजेंडा में है?
वर्तमान में स्वच्छ भारत मिशन के तहत कचरा पृथक्करण के बड़े‑बड़े विज्ञापन चल रहे हैं, पर अक्सर कहा जाता है, “पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं” या “लॉजिस्टिक समस्या है”। परिणामस्वरूप, घर‑घर से निकाली गई फलों की बर्बादी फिर भी लैंडफ़िल में जमा हो जाती है, जहाँ उसे दबाकर हाइड्रोजन मीथेन में बदल दिया जाता है—जिससे वायुमंडलीय प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुँचा। उसी बीच, छोटे‑बड़े किसानों और शहरी उद्यानियों को रासायनिक उर्वरकों की ऊँची कीमतें चकित करती रहती हैं, जो अक्सर आय के अनुपात में असमानता को और गहरा देती हैं।
विज्ञान यह बताता है कि सिट्रस, खरबूजे, केले, अमरूद और संतरे के छिलके में पोटेशियम, फॉस्फोरस और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व भरपूर होते हैं। इन्हें छोटे‑छोटे टुकड़ों में काट कर, थोड़ी सी मिट्टी के साथ गठित करके, दो‑तीन हफ्तों में सूखा कंपोस्ट तैयार किया जा सकता है। यह प्रक्रिया न केवल धूसर कचरे की मात्रा घटाती है, बल्कि स्थानीय स्तर पर जैविक खेती को भी सशक्त बनाती है। नगर निगम के निपटान केन्द्रों में यह तकनीक अपनाने की कोई मंचिक योजना नहीं दिखती, जबकि शहर के कई भागों में जीवाश्म‑ऊर्जा‑आधारित उर्वरकों की कीमतें बढ़ती जा रही हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, केवल बड़े शहरों में प्रति वर्ष पाँच लाख टन किचन वेजिटेबल वेस्ट को उचित प्रबंधन न मिलने के कारण लैंडफ़िल में डाला जाता है। यदि इस कचरे का आधा भाग घर‑घर में कंपोस्ट बनाकर उपयोग किया जाए, तो न केवल लैंडफ़िल के बोझ में कमी आएगी, बल्कि शहरी हरी पट्टियों की क्षमताएँ भी बढ़ेंगी। परंतु इस समाधान को विफलता का आँकड़ा लिखते हुए, प्रशासन अक्सर “व्यक्तिगत पहल” को “सिस्टम की समस्या” से अलग कर देता है।
समाप्ति की ओर देखे तो, फलों के छिलके को घर पर उर्वरक बनाना कोई जटिल तकनीक नहीं, बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता है, जिसका समर्थन नीतिनिर्माता, शहरी नियोजक और स्थानीय निकायों को मिलकर करना चाहिए। बस एक ही बात स्पष्ट है—कचरे को कम करने के लिए जो “शून्य‑लागत” उपाय घर के आस‑पास मौजूद है, उसे उठाने में प्रशासन की चुप्पी अब अनदेखी नहीं रह सकती।
Published: May 8, 2026