शहरों में छुपी विटामिन‑डी कमी: स्वास्थ्य‑संबंधी लापरवाह नीतियों की चेतावनी
वर्तमान में भारत के शहरी क्षेत्रों में कई लोग अनजाने में विटामिन‑डी की कमी का सामना कर रहे हैं। थकान, निरुद्देश्य उदासी, बार‑बार संक्रमण और शरीर में दर्द—इन सामान्य लक्षणों को अक्सर तनाव या साधारण बीमारी के रूप में खारिज कर दिया जाता है, जबकि वे विटामिन‑डी की कमी के प्रारम्भिक संकेत हो सकते हैं।
समाज के बदलावों ने इस समस्य को और जटिल बना दिया है। बढ़ती प्रदूषण के कारण सूर्य की रोशनी से बचाव, एसी‑रूम में काम‑जीवन, बच्चों की घर में ही पढ़ाई, और महिलाओं के पारंपरिक घर के कामों से बाहर निकलने की सीमित संभावना—all ने सूर्य के संपर्क को घटा दिया है। विशेषकर मध्यम वर्ग और निम्न आय वाले परिवारों में जिनकी खाने‑पीने की आदतें पोषक तत्वों से भरपूर नहीं हैं, विटामिन‑डी की कमी एक सामाजिक असमानता बन गई है।
ज्यादा प्रभावित वर्गों में गँभीर महिला, छोटे बच्चे, बुजुर्ग नागरिक और शारीरिक रूप से दुर्बल लोग शामिल हैं। एक हालिया सर्वे में कहा गया कि अधिकतर स्कूल‑बच्चे और डाक्टरों के पास भी पर्याप्त सूर्य का समय नहीं होता, जिससे भविष्य की पीढ़ी में प्रतिरक्षा शक्ति घटने का खतरा बढ़ता है।
हालाँकि केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय पोषण योजना और मध्याह्न भोजन में विटामिन‑डी फोर्टिफिकेशन के प्रावधानों की घोषणा की है, लेकिन जमीन स्तर पर इन कदमों का कार्यान्वयन अक्सर ‘कागज पर वाला’ ही रहता है। कई राज्य अपने स्वयं के पोषण कार्यक्रमों को लेकर अभिमानी होते हुए भी, आवश्यक फूड‑फोर्टिफिकेशन की निगरानी के लिए कोई ठोस तंत्र नहीं बनाते। परिणामस्वरूप, कैंटन‑कैंटीन में ‘विटामिन‑डी‑युक्त’ दाल‑चावल का लेबल दिखता तो है, पर वास्तव में उसमें जरूरी मात्रा नहीं मिल पाती।
इस अभाव को न्यायिक समीक्षा के सपनों के साथ, प्रशासन अक्सर ‘रिपोर्ट‑पर‑रिपोर्ट’ की बौड़‑बौड़ में उलझा रहता है। जैसे‑कई नीतियों के दस्तावेज़ तैयार होते हैं, फिर उन्हें ‘संभावित भविष्य के उपयोग’ के लिए फाइलों में रख दिया जाता है—जब तक कि अगली बार की योजना बनाते समय वही दस्तावेज़ फिर से बाहर नहीं निकला।
सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से यह समस्या गंभीर है। विटामिन‑डी की कमी न केवल व्यक्तिगत जीवन की गुणवत्ता घटाती है, बल्कि काम‑काज, शिक्षा और स्वास्थ्य‑सेवा प्रणाली पर अतिरिक्त बोझ डालती है। बीमारी से काम‑दर में कमी, टैलेंट की हानि और बढ़ते स्वास्थ्य खर्च—इन सबकी जड़ें इस अनदेखी पोषक तत्व की कमी में ही निहित हैं।
समाधान स्पष्ट है: सड़कों पर सूर्य‑सुरक्षित जागरूकता अभियानों, स्कूल‑कॉलेज में नियमित रक्त‑परीक्षण, और खाद्य फोर्टिफिकेशन के कड़ाई से लागू होने वाले मानकों की आवश्यकता है। जब तक प्रशासन अपने ‘फॉर्म‑भरण’ के दोहराए जाने वाले खेल को छोड़कर वास्तविक कार्य नहीं करेगा, विटामिन‑डी की यह लुप्त‑प्रचुर समस्या समाज के नीचे बहती रहेगी।
Published: May 3, 2026