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Category: समाज

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शहरी बस्तियों में कॉपरहेड साँपों का खतरा बढ़ा, सुरक्षा उपायों में प्रशासन की सुस्ती

घनघोर छाया, ढेरों लकड़ी और अनियंत्रित सड़कों की गंदगी—इन साधारण शहर के कोनों में अब कॉपरहेड साँपों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। अपनी घड़ी‑आकार की घड़ियाल जैसी काली‑भूरी धारी और कठोर शरीर के कारण ये सर्प घर‑बगीचे में आसानी से छिप जाते हैं, जिससे अचानक मिलने पर बिच्छू के काटने जैसा डर पैदा होता है।

मुख्यतः मध्यम वर्गीय तथा कामगार वर्ग के मक्तुब घरों में इन साँपों का आवास बढ़ रहा है। लकड़ी के ढेर, बगीचे की मोटी घास, बेसमेंट में जमा कचरा और बेकार गंदगी ऐसे ही ठिकाने बनते हैं जहाँ साँप आराम से शिकार की प्रतीक्षा करते हैं। परिणामस्वरूप क्षेत्रीय अस्पतालों में साँप के इंसटिक्शन के कारण मिलने वाली चोटों की दर पिछले साल की तुलना में २५ % तक बढ़ी है।

हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने कई बार चेतावनी जारी करने का दावा किया, वास्तविक तौर पर कोई सक्रिय अभियान या सामुदायिक प्रशिक्षण नहीं हुआ। गांव‑शहर के बीच के प्रशासनिक गलियारे में यह चर्चा चल रही है कि इस सिलसिले में निपटने के लिये एक समुच्चय योजना बनी है, परन्तु वह योजना अभी तक ‘ड्राफ्ट’ ही रह गई है। नगर निगम की ओर से तो केवल ‘सफाई—नियमित’ टॉपिक के तहत बिखरे हुए कचरे को हटाने का प्रस्ताव आया, जबकि यह मानते हुए कि समस्या का मूल कारण ‘सुरक्षा जागरूकता की कमी’ है। यहाँ तक कि कुछ अधिकारी इस बात पर ‘साँप भी प्रकृति का हिस्सा हैं, उन्हें मारना नहीं चाहिए’ कह कर मुद्दे को मोड़ते दिखते हैं—एक नियम के रूप में नहीं, बल्कि व्यंग्यात्मक आश्चर्य के रूप में।

निवासियों ने अब तक कई शहरी वार्डों में स्वर उठाया है, माँगे हैं कि स्थानीय प्रशासन तुरंत ही निम्नलिखित कार्यवाही करे: (i) सामुदायिक स्तर पर पहचान‑प्रशिक्षण शिविर आयोजित करना, (ii) सफ़ाई‑पुनर्चक्रण को तेज़ी से लागू करना, (iii) घर‑बगीचे में साँप‑रहित माहौल निर्माण हेतु वैकल्पिक बायो‑ड्रायवॉल उपयोग की सलाह देना, तथा (iv) संभावित मामलों के लिए शीघ्र चिकित्सा सहायता केंद्रों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।

यदि इस निरंतर चुप्पी को जारी रहने दिया गया तो न केवल नागरिक स्वास्थ्य पर असहनीय बोझ पड़ेगा, बल्कि प्रशासनिक भरोसे की नींव भी क्षीण होगी। यह मुद्दा अब केवल एक जीवकी पहचान नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, नगरपालिका प्रबंधन और सामाजिक न्याय के परस्पर जुड़े प्रश्न बन चुका है।

Published: May 6, 2026