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Category: समाज

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शहरी क्षेत्रों में हरियाली की कमी: नागरिकों को स्वयं ही फूल लगाकर कल्याण बढ़ाना पड़ेगा

मई का महीना, जब अधिकांश भारतीय बागवानी प्रेमियों को बग़ीचे सजा-धजा कर रंग भरने का अवसर मिलता है, उसी समय हमारे कई महानगरों में खाली जमीनें महज कंक्रीट की सतहें बन चुकी हैं। कॉसमोस, ज़िन्निया और नास्टुर्ती जैसे तेज़‑बढ़ने वाले वार्षिक पौधे कुछ ही हफ्तों में फूलों की कली बिछा देते हैं, परन्तु इनकी पनाह‑स्थान तक पहुँचाना अक्सर प्रशासनिक अडचन बन जाता है।

साइकलन, पॉलिनेशन और पर्यावरण‑स्वास्थ्य के तीन‑स्तरीय लाभ स्पष्ट हैं: ये फूल न केवल मनोवैज्ञानिक ताजगी प्रदान करते हैं, बल्कि शहद‑मक्खियों तथा बटरफ्लाई जैसी स्थानीय परागणकर्ताओं को आकर्षित करके शहरी कृषि के सूक्ष्म आधार को सुदृढ़ करते हैं। फिर भी, कई नगर निगमों के बगीचा‑विकास विभागों की वार्षिक रिपोर्टों में ‘हरित पहल’ के नाम पर केवल बैंकरोलेट्स के मोटे आंकड़े दिखते हैं, जबकि जमीन‑उपलब्धता, पानी की सप्लाई और रख‑रखाव की वास्तविक तैनाती में गंभीर ढिलाई रहती है।

शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति और नाजुक है। कई सरकारी स्कूलों के प्रांगण में कक्षा‑केन्द्रित परिदृश्य के बजाय खाली धातू की बेंचें और फुटपाथ हैं। जब स्वयंसेवी संगठनों ने इन क्षेत्रों में कॉसमोस‑बेड लगाकर बच्चों को प्रकृति विज्ञान के प्रयोगशालाएँ प्रदान करने का प्रस्ताव रखा, तो मंजूरी प्रक्रिया में ‘पर्यावरण‑स्थिरता प्रॉजेक्ट’ की श्रेणी के नाम पर अतिरिक्त फ़ॉर्म तथा जल‑परिचालन योजना का ‘विचार‑सत्र’ निर्धारित किया गया – एक ऐसा ‘विचार‑सत्र’ जो अक्सर महीने‑भर के बाद ही रद्द हो जाता है।

इस असमानता में सरकारी पहलों की कमतरि स्पष्ट है। ‘हरित भारत मिशन’ का बजट बढ़ाने की घोषणा अक्सर नज़रअंदाज़ कर दी जाती है, और बुनियादी पानी‑सेवा के अभाव में स्थानीय निवासी खुद ही तालाबों से पानी लेकर बीज बोते हैं। मेजबान‑शहर के अधिकारी बैठकों में ‘कर्नाटक‑डिज़ाइन‑सेटअप’ के नाम पर विविध शब्दजाल से भरते हैं, जबकि जमीन‑परिवर्तन की वास्तविक लागत प्रभावी रूप से नहीं उठाते।

ऐसे परिदृश्य में नागरिक स्वयं ही समाधान बन रहे हैं। पड़ोस‑स्तर पर स्वयंसेवी समूहों ने मई के शुरुआती हफ्तों में १,५०० वर्ग मीटर भूमि को ‘फुलवारी’ में बदल दिया, जहाँ कॉसमोस, ज़िन्निया और नास्टुर्ती के तेज़‑बढ़ते फूलों ने न केवल रंग‑बिरंग माहौल तैयार किया, बल्कि मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालते हुए स्थानीय शहरी जनसंख्या को एक अतिरिक्त वायु‑शुद्धिकरण स्त्रोत भी उपलब्ध कराया। यह पहल दर्शाती है कि नीतियों की ठहराव पर भी जनता अपनी शक्ति से ‘हरा‑भरा’ भविष्य गढ़ सकती है, बशर्ते प्रशासन की उदासी को कम करके सही दिशा‑निर्देश मिलें।

Published: May 7, 2026