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Category: समाज

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शरीर भाषा के शुरुआती संकेतों की अनदेखी से सामाजिक एवं कार्यस्थल बाधाएँ बढ़ रही हैं

शरीर भाषा, यानी बिना बोले हमारे मन की गहराइयाँ बताने का तरीका, अब सिर्फ़ मनोविज्ञान की पुस्तक में नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के कई क्षेत्रों में एक अनिवार्य कौशल बन चुका है। हालिया विशेषज्ञों के सर्वेक्षण से पता चलता है कि छात्र‑छात्राओं के कक्षा में ‘पैर की दिशा’ और कर्मचारियों के मीटिंग‑रूम में ‘कुर्सी की झुकाव’ अक्सर उनके वास्तविक थकान, उत्साह या तनाव को बयां करती हैं। परंतु इस सहज संकेत को पहचानने की क्षमता में भारत के कई शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी दफ्तरों में खामियां स्पष्ट दिखाई देती हैं।

शिक्षा विभाग के विभिन्न राज्य सरकारों ने ‘संवादी कौशल’ को पाठ्यक्रम में शामिल करने की घोषणा की है, परंतु इस घोषणा के बाद भी कक्षा‑कुर्सी में खड़े‑खड़े ही पढ़ने वाले छात्रों को अपने शरीर के सूक्ष्म संकेतों को समझने का कोई व्यवस्थित प्रशिक्षण नहीं मिला। परिणामस्वरूप, शिक्षक अक्सर छात्रों की असहजता को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जिससे ऊँची ड्रॉप‑आउट दरें और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं।

कार्यस्थल पर भी यही परिदृश्य दोहराता है। कई सार्वजनिक कार्यालयों में कर्मचारियों की ‘पैरों की हलचल’ या ‘आँखों की चमक’ को पढ़ने में औपचारिक प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। यह अनदेखी न केवल कार्य क्षमता को घटाती है, बल्कि कर्मचारी‑से‑नियोक्ता विश्वास को भी कमज़ोर बनाती है। कुछ उद्यमियों ने कहा है, “यदि बोर्डरूम में टेबल पर बैठे व्यक्ति की कंधे झुकी हुई दिखे, तो हमें पता चलता कि वह प्रोजेक्ट से नफरत कर रहा है—पर विकल्प सिर्फ़ एक ही है, रिपोर्ट लिखवाना।” यह व्यंग्यात्मक टिप्पणी दर्शाती है कि नीति‑निर्माताओं ने कभी‑कभी सादगी से बिखरी हुई संकेतों को “डाटा” में बदलने के बजाय, बस “रिपोर्ट” बनाने में ही लगा दिया है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में इस मुद्दे की गंभीरता और भी अधिक है। डॉक्टर‑रोगी के बीच की बातचीत में रोगी के ‘हाथों की हिलचल’ या ‘सिर की झुकाव’ रोग की गंभीरता का संकेत दे सकते हैं। परंतु सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में अक्सर केवल रक्त‑चाप या रक्त‑शर्करा जैसी मात्रात्मक जाँच होती है, जबकि रोगी के शारीरिक संकेतों को पढ़ने के लिए कोई मानकीकृत प्रोटोकॉल नहीं है। यह न केवल रोगी के उपचार में देरी करती है, बल्कि अनवांछित अस्पतालियों की संख्या को भी बढ़ा देती है।

इन परिप्रेक्ष्य में प्रशासन की प्रतिक्रिया देखी जाए तो, कई राज्य सरकारों ने ‘कुशल संचार प्रशिक्षण’ के नाम पर केंद्रित कार्यशालाओं की घोषणा की है—पर इन कार्यशालाओं में अक्सर केवल “इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी‑ड्रिवन” स्लाइड्स दिखायी जाती हैं, मानव शरीर की ‘नॉन‑वर्बल लँग्वेज’ को समझने के व्यावहारिक पहलू को दरकिनार किया जाता है। व्यंग्य यह है कि, जहाँ एक ओर सरकारी दस्तावेज़ों में ‘डेटा‑बेस्ड निर्णय‑लेना’ के शब्द सुनाई देते हैं, वहीं इस डेटा को उत्पन्न करने की मूलभूत क्षमता ही अक्सर ‘बिना शब्दों के बात करने’ के कारण नहीं विकसित हो पाती।

समाज को इस स्थिति से बाहर निकालने के लिये दो‑तीन ठोस कदम आवश्यक हैं: पहला, शैक्षणिक पाठ्यक्रम में ‘शारीरिक संकेत विश्लेषण’ को विज्ञान के समान ही अनिवार्य भाग बनाया जाए; दूसरा, सार्वजनिक‑सहकारी संस्थाओं में ‘नॉन‑वर्बल एन्हांसमेंट टूलकिट’ का निर्माण कर, कर्मचारियों को व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया जाए; तीसरा, स्वास्थ्य प्रोफ़ाइल में ‘शारीरिक संकेत स्कोरिंग’ को मानक मान्यताओं में शामिल किया जाए। बिना इन उपायों के, आज की प्रशासनिक व्यवस्था सिर्फ़ ‘शब्दों का जाल’ बुनती रहेगी, जबकि वास्तविक मानव भावनाएँ वहीँ चुपचाप चीखें मार रही होंगी।

Published: May 6, 2026