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Category: समाज

शाहिद कपूर के पालन‑पोषण सिद्धांत ने उजागर किया सुरक्षा नेटवर्क की आवश्यकता

बॉलीवुड के अभिनेता शाहिद कपूर ने हाल ही में अपने एक सरल ‘पेरेंटिंग रूल’ को सार्वजनिक किया—बच्चों को जिम्नास्टिक के समान एक सुरक्षित जाल प्रदान करना, जहाँ वे बिना घातक परिणामों के अपनी गलतियों से सीख सकें। उन्होंने इस विचार को ‘नैतिक कम्पास’ और ‘नि:शर्त प्यार’ के साथ जोड़ते हुए कहा कि ऐसे माहौल में बच्चा आत्म‑विश्वास और लचीलापन विकसित करता है।

साथ ही, इस व्यक्तिगत अनुभव ने सामाजिक स्तर पर ऐसे प्रश्न खड़े कर दिए जो शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याण नीतियों को सीधे प्रभावित करते हैं। आज अधिकांश शहरी स्कूलों में भी बुनियादी ‘सुरक्षा जाल’ की कमी है—बिना उचित मनोवैज्ञानिक समर्थन के असफलता को दण्डित किया जाता है, जबकि स्वयं‑खोजी की प्रक्रिया को दबाया जाता है। इस असंतुलन से छात्र‑अधिग्रहण, बर्न‑आउट और मनोवैज्ञानिक तनाव में वृद्धि हो रही है, जिसका प्रत्यक्ष असर राष्ट्रीय स्वास्थ्य आँकड़ों में दिख रहा है।

वहीं ग्रामीण तथा अंडर‑सर्विस्ड क्षेत्रों में तो स्थिति और भी गंभीर है। सरकारी बाल सुरक्षा योजनाओं की कार्यान्वयन दर कई सालों में स्थिर या घटती ही दिख रही है। शैक्षणिक संस्थानों में काउंसलिंग सेंटर्स, नर्सिंग पोड्स या ‘असफलता के बाद पुनर्स्थापना’ के प्रोटोकॉल की अनुपस्थिति, इन क्षेत्रों के बच्चों को अनावश्यक जोखिम में डालती है।

शाहिद कपूर के ‘जिम्नास्टिक‑सुरक्षा‑जाल’ के रूपक को अपनाना, तभी सार्थक होगा जब नीति‑निर्माताओं द्वारा वास्तविक ढाँचा तैयार किया जाए—जैसे कि स्कूल‑स्तरीय मनोवैज्ञानिक मदद, शिक्षक प्रशिक्षण में लचीलापन‑शिक्षा का समावेश, तथा स्थानीय स्तर पर बाल संरक्षण इकाइयों की सुदृढ़ता। वर्तमान में कई राज्य सरकारें इस दिशा में केवल बैनर अभियानों तक सीमित हैं, जबकि फील्ड‑लेवल पर निगरानी और संसाधन आवंटन में ढिलाई बरकरार है।

सभी मिलकर यदि एक राष्ट्रीय ‘बाल‑त्रुटि‑सुरक्षा मोड्यूल’ स्थापित किया जाए, जहाँ हर विद्यालय में एक न्यूनतम सुरक्षा जाल (जैसे कि पुनरावृत्ति‑पर‑परामर्श, वैकल्पिक मूल्यांकन पद्धति, और भावनात्मक समर्थन) अनिवार्य हो, तो यह शाहिद कपूर द्वारा बताई गई लचीलापन‑परक पेरेंटिंग का सामाजिक स्तर पर प्रतिरूप बन सकता है। इस दिशा में न केवल बच्चों को बल्कि उनके अभिभावकों, शिक्षकों और नीति‑निर्माताओं को भी दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।

संक्षेप में, शाहिद कपूर का व्यक्तिगत अनुभव सामाजिक नीति में एक सूक्ष्म लेकिन आवश्यक परिवर्तन की चेतावनी देता है—सुरक्षा जाल के बिना कोई भी ‘गिरावट’ केवल एक दुर्घटना बन जाती है, न कि सीख। इस बात को समझते हुए, प्रशासन को अब शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस कार्यों से अपने दायित्व को साकार करना होगा।

Published: May 6, 2026