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शारीरिक स्वार्थीता: बाहरी शोभा के पहरे में छिपा सामाजिक खतरा
फ़ैशन ब्लॉग, फिटनेस इन्फ्लुएंसर और "अभी‑ही‑तैयार" वीडियो‑ट्यूटोरियल जैसी डिजिटल लहरों ने भारत के शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में आत्म‑छवि को नई प्राथमिकता दी है। बाहरी रूप‑रंग को निरन्तर उन्नत करने का प्रयास अब सिर्फ व्यक्तिगत आत्म‑विश्वास की बात नहीं रहा; यह कई वर्गों के लिए पहचान का एकमात्र आधार बन चुका है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रवृत्ति को "शारीरिक स्वार्थीता" कहा जाता है – एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति जिसमें शरीर, रूप‑रंग और फिटनेस को ही आत्म‑मूल्य का प्रमुख स्रोत मान लिया जाता है। इसके प्रमुख लक्षणों में निरन्तर स्व–फोटो साझा करना, जिम में घंटों बिताना, सामाजिक मंचों पर बाहरी मानकों की तुलना से लगातार असंतोष, तथा आत्म‑सम्मान के लिए बाहरी मान्यता पर निर्भरता शामिल हैं। यह नज़रिए न केवल व्यक्तिगत तनाव को बढ़ाता है, बल्कि सामाजिक असमानताओं को भी गहरा करता है।
शहरी स्कूल‑कॉलेज के युवाओं में इस प्रवृत्ति की तेज़ी से फैलाव हुआ है, जहाँ पर “लग्ज़री दिखना” को शैक्षणिक या पेशेवर सफलता से बराबर माना जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी मोबाइल इंटरनेट की पहुँच से यह प्रभाव पनप रहा है, परंतु जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण इसका दुरुपयोग स्पष्ट होता जा रहा है।
राष्ट्रीय स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य नीतियों में इस नई जेनरेटिव समस्या को समझने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं दिखा है। सरकारी आँकड़े में सौंदर्य‑आधारित मनोवैज्ञानिक विकारों को अलग से वर्गीकृत नहीं किया गया, और सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं में इस दिशा में निधि आवंटित नहीं की गयी। परिणामस्वरूप कई युवा परामर्श केंद्रों तक पहुँच नहीं पाते, जबकि ऑनलाइन मंचों पर निंदा और हेराफेरी सतत चलती रहती है।
नीति‑निर्माताओं की ओर से “डिजिटल साक्षरता” और “मनोवैज्ञानिक कल्याण” के प्रस्ताव अक्सर सुनवाई के बाद ही बंद हो जाते हैं। सबूत में सरकार ने एस्थेटिक‑सर्जरी या प्रतिबंधित फिटनेस उत्पादों को नियामक ढांचे से बाहर रखा है, जबकि समान्य नागरिकों को इनसे बचने के लिए कोई वैकल्पिक मार्ग नहीं दिया गया। यह विफलता उस समय और स्पष्ट हो जाती है, जब सार्वजनिक स्वास्थ्य वाणिज्यिक सौंदर्य‑उद्योग के साथ मिलकर अपना व्यापारिक मोड़ तय करता है।
समाज के कई वर्ग, विशेषकर बाध्यकारी आर्थिक परिस्थितियों में रहने वाले वर्ग, इन शक्तिशाली प्रवृत्तियों को प्रतिरोध नहीं कर पाते। वे या तो असहनीय आत्म‑संघर्ष में फँसते हैं, या फिर आकर्षक दिखावे के झूठे वादे में फँसकर आर्थिक दवाब के शिकार बनते हैं। इस सामाजिक असमानता को कम करने के लिए आवश्यक है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया जाए, साथ ही स्कूल‑कॉलेज में शारीरिक छवि से परे आत्म‑मूल्य की शिक्षा दी जाए।
जैसे ही प्रशासन “स्वस्थ भारत” की घोषणा करता है, वहीँ इस नई प्रकार की अस्वस्थता की अनदेखी की जाती है। नियामक ढांचा, उपभोक्ता संरक्षण और मानसिक स्वास्थ्य नीति को एक साथ जोड़कर ही शारीरिक स्वार्थीता के सामाजिक‑आर्थिक प्रभाव को कम किया जा सकता है। तभी यह उम्मीद की जा सकेगी कि भारतीय नागरिक अपनी पहचान को बाहरी छवि के बजाय बौद्धिक, सांस्कृतिक और नैतिक गुणों के आधार पर पुनः स्थापित कर सकें।
Published: May 7, 2026