विज्ञापन
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?
आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें।
शुरुआती अल्ज़ाइमर रोगों पर शोध में सरकारी फंडिंग में कटौती ने झटका दिया
भारत में कुछ दुर्लभ जीन‑म्यूटेशन के कारण मध्य आयु में अल्ज़ाइमर रोग उत्पन्न होने वाले रोगियों के परिवारों ने विज्ञान जगत को एक अनूठा अवसर प्रदान किया है। इन रोगियों के मस्तिष्क में जमा होने वाली प्रोटीन की संरचना, रोग की प्रगति और संभावित उपचारों के परीक्षण के लिए एक तेज़ी भरा मॉडल तैयार करती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस समूह को अलग‑अलग करके देखना, दवाओं की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कई सालों की प्रतीक्षा के बिना कर सकता है।
परन्तु हाल ही में केन्द्र सरकार द्वारा स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए आवंटित बजट में महत्वपूर्ण कटौती की गई है। यह कदम, जो कि विभिन्न मंत्रालयों के बीच संसाधनों के पुनःवितरण के नाम से आया है, विशेष रूप से न्यूरोडिजनरेटिव रोगों के शोध को क्षति पहुँचाने की आशंका पैदा कर रहा है। शोध संस्थानों के प्रमुख ने कहा, "भविष्य में रोगियों के जीवन को बचाने वाले दवाओं की आशा इस कटौती के कारण धूमिल हो रही है"।
इस नीति परिवर्तन का असर सबसे पहले उन परिवारों पर पड़ रहा है, जो अपने प्रियजनों को इस जटिल बीमारी से जूझते देख रहे हैं। कई बार इन परिवारों को आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक दुविधाओं का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उचित देखभाल के साधन पहले से ही सीमित हैं। अब, जब शोध धीमा हो रहा है, तो रोगियों के लिए संभावित नई दवाओं या नैदानिक परीक्षणों में भाग लेने का अवसर कम हो रहा है।
सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्रणाली में अल्ज़ाइमर और अन्य डिमेंशिया रोगों की बढ़ती ट्रेंड को देखते हुए, इस तरह की फंड कटौती को अक्सर प्रशासनिक ‘पहले‑से‑बाद’ के रूप में वर्गीकृत किया जा रहा है। विशेषज्ञों का तर्क है कि समग्र राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में संज्ञानात्मक विकारों को प्राथमिकता नहीं दी गई है, जबकि वृद्ध जनसंख्या में इस रोग की प्रचलन दर निरन्तर बढ़ रही है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस मुद्दे पर कहा कि "वित्तीय संसाधन सीमित हैं और उन्हें अधिक तत्काल सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों को संबोधित करने के लिए पुनः वितरित किया जा रहा है"। यह बयान सुनकर देर-सुबह के भोजन में चाय की चुस्की लेते हुए कुछ नीति‑निर्माताओं पर तंज़ भी नहीं रुकता, क्योंकि कमजोर वर्ग के लिए इस तरह के कटौती के दीर्घकालिक आर्थिक बोझ को अक्सर गणना में नहीं लिया जाता।
अंत में, यह स्पष्ट है कि प्रारंभिक‑आयु अल्ज़ाइमर रोग के अनुसंधान में फंडिंग के इस कटौती का प्रभाव न केवल वैज्ञानिक प्रगति को रुकावट में डाल रहा है, बल्कि रोगियों और उनके परिवारों के भविष्य को भी अनिश्चित बना रहा है। नीति‑निर्माताओं से अपेक्षा है कि वे इस सामाजिक‑वैज्ञानिक द्वंद्व को समझें और उचित संसाधन पुनः आवंटित कर इस महत्त्वपूर्ण शोध को फिर से गति दें।
Published: May 8, 2026