शिक्षा माफिया को रोकने की लड़ाई: एनएचआरसी सदस्य ने किफायती NCERT/SCERT किताबों के उपयोग का आदेश दिया
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य प्रियांक कणुंगो ने आज सार्वजनिक तौर पर एक बड़े षड्यंत्र की ओर इशारा किया, जिसे उन्होंने ‘शिक्षा माफिया’ कहा। उनका कहा है कि निजी स्कूलों में महँगी निजी प्रकाशकों की किताबों को बेचना, सस्ते NCERT व SCERT पदपुस्तकों को लागू करने के उनके आदेश को नाकाम करने की कोशिश कर रहा है।
कणुंगो ने बताया कि यह आंदोलन सीधे उन गरीब‑मध्यम वर्गीय परिवारों को लक्षित करता है, जो हर साल पाठ्यपुस्तकों के बोझिल बिलों से जूझते रहते हैं। एक सामान्य प्राथमिक‑उच्च माध्यमिक छात्र के लिए, उचित NCERT/SCERT पुस्तकें लगभग 2,000 रुपये की होती हैं, जबकि निजी प्रकाशकों की वैकल्पिक कृतियों की कीमत 3,500‑5,000 रुपये के बीच बदलती है। यह अंतर, कई घरों के बजट में असमानता पैदा करता है और शिक्षा में वर्गीय विभाजन को गहरा करता है।
आदेश के जारी होने के बाद, “शिक्षा माफिया” के रूप में वर्गीकृत कुछ हितधारकों ने वैकल्पिक उपाय अपनाने की कोशिश की – चाहे वह नियामक बाबियों को उलट‑फेर करने की बात हो या स्कूल प्रशासन को वैकल्पिक पुस्तक चयन की अनुमति देने की। कणुंगो ने स्पष्ट किया कि इन प्रयासों को “संतुलित नहीं” किया जा सकता और वे “नीति के प्रवर्तक” नहीं, बल्कि “वित्तीय दबाव” का हथियार हैं।
हिन्डुस्तानी शिक्षा नीति के तहत, NCERT तथा राज्य‑स्थापित SCERT बोर्डों के निर्देशित पाठ्यक्रम को अनिवार्य बनाना एक दीर्घकालिक सार्वजनिक लक्ष्य रहा है। इसका मकसद न केवल मूलभूत ज्ञान को समान बनाना है, बल्कि शिक्षा के बाजार‑आधारित मूल्यों को कम करके सामाजिक असमानता को घटाना भी है। वर्तमान संदेह, इस लक्ष्य को नष्ट करने की कोशिश को उजागर करता है।
प्रक्रिया के प्रति प्रशासनिक प्रतिक्रिया अब तक आधिकारिक रूप से नहीं आई, परन्तु यह स्पष्ट है कि मौजूदा नियामकीय ढाँचा इस प्रकार की “अवरुद्धता” के लिए पर्याप्त नहीं। इस परिदृश्य में, नीतिगत कार्यान्वयन की कमजोरियों को बुदबुदाते हुए कहा जा सकता है कि “क्लासरूम की फुसफुसाहट” को सुनने के बजाय “पुस्तक दुकानों की गूँज” को तेज़ी से बढ़ावा दिया जा रहा है।
कणुंगो ने यह भी कहा कि उनका संघर्ष यह नहीं है कि “उच्च कोटि के पुस्तक विक्रेताओं को हटाया जाए”, बल्कि यह कि सभी बच्चों को समान और सस्ती शिक्षा सामग्री तक पहुँच सुनिश्चित की जाए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अदालत के सुनवाई में, इस आदेश को पलटने की “सभी कोशिशें व्यर्थ” होंगी और “सामाजिक न्याय” की इच्छा के साथ आगे बढ़ते रहेंगे।
इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि जब तक पुस्तक लागत को महँगा रखने वाले आर्थिक समूहों को जवाबदेह नहीं ठहराया जाता, तब तक नीतियों का वास्तविक प्रभाव सामाजिक स्तर पर जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच पाता। सार्वजनिक हित में उठाया गया यह कदम, शिक्षा‑संबंधी असमानताओं को हटा कर एक सभ्य, समावेशी भारत की ओर एक कदम हो सकता है – बशर्ते नियामकों और नीतिनिर्माताओं का ‘सजग’ रवैया बना रहे।
Published: May 6, 2026