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Category: समाज

व्हाट्सएप समूह के ‘लाइफसेवर’ अभियान ने वेंडर्स्पून में बेघर लोगों के लिए लाखों भोजन जुटाए

एक व्हाट्सएप समूह, जिसे अक्सर लाइफसेवर कहा जाता है, ने पिछले दो वर्षों में रॉयल सैलून वेंडर्स्पून श्रृंखला से बेघर नागरिकों के लिए दसियों हजार भोजन की व्यवस्था की। समूह ने इस कार्य को फेसबुक पेज के माध्यम से संचालित किया, जहाँ सदस्य अपनी इच्छा अनुसार खाने‑पीनے की वस्तुएँ ऑर्डर करते हैं, और उन्हें बेघर लोगों में वितरित किया जाता है।

समूह के सदस्य बताते हैं कि उन्होंने अब तक लगभग 70,000 भोजन‑पदान्‍ति इकाइयाँ खरीदी हैं, जो प्रतिदिन सैकड़ों लोगों को पोषित करती हैं। इस पहल का भौगोलिक दायरा केवल शहर के केंद्र तक सीमित नहीं है; कई उपनगरों और शहरी द्वीप क्षेत्रों के बेघर वर्ग ने इस मदद को अपनाया है।

साक्षात्कार में सामने आया एक प्रमुख उदाहरण कार्ल का है, जो पहले कई पब और होटलों के मालिक थे। दो साल पहले बढ़ते खर्चों ने उन्हें दिवालिया कर दिया और अब वह समुद्र‑तट पर सोता है और सर्दियों में एक 24‑घंटे खुले मैकडॉनल्ड्स में एक कप कॉफ़ी के साथ दिन बिताता है। कार्ल अपने दो बेटों‑बेटियों को वीडियो‑कॉल के दौरान वेंडर्स्पून के खाने‑पीनے के साथ दिखाता है, ताकि वे उसे सामान्य जीवन जीता हुआ समझ सकें। इस भ्रम को बनाए रखने में समूह द्वारा जुटाए गए भोजन ने मदद का हाथ बढ़ाया है।

समस्या की पैमाना अभी भी गहरी सामाजिक असमानता में निहित है। राष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले नागरिकों की संख्या में पिछले पाँच वर्षों में 18 % की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि सरकारी आर्थिक सहायता पर चर्चा अभी भी अडिग है। कई बेघर लोगों के लिए भोजन, आश्रय और स्वास्थ्य देखभाल की बुनियादी सुविधा की कमी, मौजूदा सामाजिक सुरक्षा तंत्र में खाई को उजागर करती है।

इन परिस्थितियों में, प्रशासनिक प्रतिक्रिया लगभग मौन रही। स्थानीय नगरपालिका ने इस पहल को “स्वयंसेवी उद्यम” कहा, लेकिन वह सार्वजनिक भोजन सुविधाओं के नियमन, खाद्य सुरक्षा मानकों और बेघर वर्ग के लिए संरचनात्मक समर्थन की संभावनाओं पर ठोस कदम नहीं उठा पा रही है। जिले के स्वास्थ्य अधिकारी ने कहा, “अगर निजी समूह यह कर सकते हैं, तो सरकारी एजेंसियों को अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए।” यह बयान, सूखा व्यंग्य के रूप में, सार्वजनिक नीति की अकार्यवाही को उजागर करता है।

वर्तमान परिदृश्य यह संकेत देता है कि सामाजिक उत्तरदायित्व का बोझ अब केवल राज्य पर नहीं, बल्कि नागरिक समाज और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी पहुँच गया है। जबकि ऐप‑आधारित समाधान अस्थायी राहत प्रदान करता है, यह दीर्घकालिक नीति‑निर्माण को बाधित नहीं कर सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के पहल को औपचारिक सामाजिक सुरक्षा ढांचे में एकीकृत करना आवश्यक है, ताकि “जारी रहना” केवल एक अभ्यस्त डिजिटल समूह तक सीमित न रहे।

इसी बीच, समूह के सदस्य आशा करते हैं कि उनकी पहल देश‑व्यापी स्तर पर अनुकरणीय मॉडल बन सके, और सरकार इस लक्षणात्मक असफलता को सुधारने के लिए साक्षी बने। अभी तक कोई आधिकारिक योजना नहीं निकली है, इसलिए बेघर वर्ग को निरंतर समर्थन की आवश्यकता बनी हुई है।

Published: May 5, 2026