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Category: समाज

वैश्विक महामारी संधि में गतिरोध, भारत अनिश्चित भविष्य की ओर

संयुक्त राष्ट्र के तहत चल रही अंतरराष्ट्रीय महामारी‑संधि को अंतिम रूप देने का प्रमुख समय‑सीमा सरकारों द्वारा चूक गया है। रोग‑जनक‑सूचना, vaccines, टेस्ट‑किट और उपचार‑साधनों के आपसी आदान‑प्रदान के नियमों पर अब तक कोई आम सहमति नहीं बन पाई है। इस कारण, अगली बड़ी बीमारी के लिए दुनिया, और विशेषकर भारत, समान स्तर पर ‘अवयवहीन’ रह गया है।

संधि के प्रमुख बिंदु दोहरी समस्या को उजागर करते हैं – एक ओर रोग‑जनकों की आवाज़ को तुरंत पहचानने व साझा करने की तैनात प्रणाली की आवश्यकता, और दूसरी ओर विकसित देशों द्वारा वैक्सीन, परीक्षण किट और उपचारों को सीमित करने के कारण उत्पन्न होने वाली असमानता। जब तक इन मुद्दों को सुलझाया नहीं जाता, तब तक भारत जैसे जनसंख्या‑घनी देश को समान पहुंच का आश्वासन नहीं दिया जा सकता।

भारत सरकार ने इस अंतरराष्ट्रीय ठहराव को लेकर कई कदम उठाने की घोषणा की है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत रोग‑जनक‑डेटाबेस को सुदृढ़ करने, घरेलू वैक्सीन उत्पादन को बढ़ावा देने और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए वैकल्पिक प्रोटोकॉल तैयार करने की बातें कही गई हैं। परंतु, वैश्विक स्तर पर सहयोग की कमी के सामने राष्ट्रीय प्रयासों का परिणाम सीमित ही रह सकता है।

विज्ञान एवं स्वास्थ्य नीति के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर राष्ट्र‑स्तरीय अनुबंधों में पारदर्शिता और न्यायसंगत लाभ‑वाटांह के सिद्धांत नहीं स्थापित होते, तो सबसे अधिक जोखिम गरीब और मध्यम वर्ग वाले देशों को उठाना पड़ेगा। इस पर “बड़े देशों का ‘स्वयं रक्षा’ मोड” ही सबको रुकावट में डाल रहा है – एक हल्की व्यंग्यात्मक टिप्पणी, लेकिन जो सच्चाई से कम नहीं है।

इसी बीच, भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के मौजूदा अंतराल बढ़ते दिख रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, परीक्षण किट की अनुपलब्धता और वैक्सीन की असमान वितरण पहले ही कई जर्नल में लिखी गई चिंताओं को दोहराते हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना इन मूलभूत समस्याओं को सुलझाया नहीं गया, तो अगली महामारी का असर भारतीय जीवन‑स्तर पर अत्यधिक हो सकता है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि वैश्विक महामारी‑संधि का ठहराव केवल राजनैतिक जाल ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रीड़ा है, जहाँ अनगिनत जीवन जोखिम में हैं। भारत को अब अपनी नीति‑निर्माण प्रक्रिया में निरंतर सामरिक सोच को अपनाते हुए, अंतरराष्ट्रीय मंच पर समान अधिकारों की मांग को दृढ़ता से आगे बढ़ाना होगा – नहीं तो अगली बड़ी बीमारी के बाद का सच और भी अधिक कठोर हो सकता है।

Published: May 5, 2026