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Category: समाज

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विवाह में हँसी‑खुशी के पीछे सामाजिक असमानता और नीतियों की खामियाँ

परिणामों को समझना आसान नहीं, परन्तु यह स्पष्ट है कि भारत में विवाह सिर्फ दो लोगों के बीच का बंधन नहीं, बल्कि रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के व्यापक ढाँचे का परीक्षा‑पात्र बन गया है। प्रसिद्ध विद्वानों, फिल्म‑संकलापों या फैशन आइकनों की चुटीले पंक्तियों में अक्सर छिपा रहता है – जाँ‑चा बिना तय‑शुदा बंधन पर हँसी‑मजाक, जबकि जमीन‑साथी परिवारों को आर्थिक झंझट, सरकारी सुविधाओं की कमी और लैंगिक विषमताओं का सामना करना पड़ता है।

आधारभूत आँकड़ों के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में निम्न‑आय वर्ग की शादी‑शुदा जोड़ों की सामाजिक सुरक्षा कवरेज में 12 % की गिरावट दर्ज की गई है। इस घटाव के पीछे प्रमुख कारण हैं: सिंगल‑पेरेंट परिवारों को मिलने वाली पेंशन का अपर्याप्त वितरण, ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों में मातृ‑सुरक्षा सेवाओं का अभाव, तथा शहरी क्षेत्रों में किफायती आवास की कमी। परिणामस्वरूप, नई शादी‑शुदा दम्पतियों को घर‑खरीदी, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य बीमा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए स्वयं‑सेवक फंड बनाना पड़ता है – जो किसी भी सामाजिक समानता की परिकल्पना को चुनौती देता है।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया भी अक्सर झोपड़ी‑घर जैसा लगता है। कई राज्य सरकारें ‘विवाह‑सहायता योजना’ का दावा करती हैं, परन्तु योजना‑विवरण में अक्सर “आवासीय ऋण में 5 % अधिकतम छूट” जैसी अल्प‑परोफाइल उपाय दिखते हैं, जबकि असली जरूरत – सुलभ मातृ‑स्वास्थ्य सेवा, पेंशन‑कवरेज की व्यापकता और कौशल‑प्रशिक्षण कार्यक्रम – अनदेखी रहती है। यह नगण्य पर्ची‑आधारित पहलें, जैसे “विवाह‑के मौके पर मुफ्त परिधान” जैसी, हँसी का कारण बन सकती हैं, परन्तु सामाजिक सुरक्षा का दायरा सिर्फ ‘विपरीत मौसम में छाता’ तक सीमित नहीं होना चाहिए।

शिक्षा‑क्षेत्र में भी समानताएँ स्पष्ट हैं। 2025‑26 में प्राथमिक स्कूल में प्रवेश हेतु न्यूनतम आयु सीमा 6 वर्ष रखी गई, परन्तु कई ग्रामीण स्कूलों में विवाह‑उपलब्धियों को लेकर ‘छात्र‑विवाह’ जैसी अनौपचारिक प्रथा अभी भी प्रचलित है। इससे लड़कियों की औसत अध्ययन अवधि तीन साल तक घट गई है, जबकि वही आंकड़ा शहरी क्षेत्रों में स्थिर है। इस विषमता को दूर करने के लिए सरकार ने ‘बालविवाह‑विरोधी पुनर्वास योजना’ का एलान किया, परन्तु वास्तविक कार्यान्वयन में जमीनी स्तर पर निगरानी तथा लॉजिस्टिक समर्थन का अभाव उजागर हो रहा है।

व्यंग्यात्मक रूप से कहा जाए तो, “शादी का बंधन ही सबसे बड़ा कॉमेडी क्लब” बन गया है, जहाँ प्रशासकों की ‘हँसी‑हँसी में’ तैयार की गई नीतियों को वास्तविक जीवन के बोझ़ के सामने टिका‑टिक कर दिया जाता है। इस स्थितिक अपूर्णता को सुधारने हेतु एकीकृत नीति‑फ्रेमवर्क की जरूरत है, जिसमें स्वास्थ्य‑सेवा, आर्थिक सहायता, शिक्षा‑समावेशन और लैंगिक समानता को समान रूप से प्राथमिकता दी जाए। तभी शादी‑संबंधी चुटकुले केवल मज़ाक रहें, न कि सामाजिक असमानता की गंभीर झलक।

Published: May 6, 2026