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Category: समाज

विदेशी लड़ाकू विमानों की खरीद में खर्च बढ़ा, सामाजिक सेवाओं की कमी पर सवाल

इज़राइल ने हाल ही में अमेरिकी निर्माताओं लॉकहीड मार्टिन और बोइंग से दो नई लड़ाकू स्क्वाड्रन, अर्थात् F‑35 और F‑15IA, के खरीद को मंजूरी दी है। विश्व सुरक्षा माहौल के इस परिवर्तन को देखते हुए, भारत के नीति निर्माणकर्ता भी समान उच्च‑तकनीकी रक्षा उपकरणों की ओर नज़र घुमा रहे हैं। लेकिन तेज़ी से बढ़ते रक्षा बजट के साथ साथ, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी नागरिक सुविधाओं के लिए आवंटित निधि निरंतर घटती जा रही है।

वित्तीय वर्ष 2026‑27 में रक्षा खर्च का अनुपात लगभग 2.5 % बन गया है, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों और ग्रामीण स्कूलों के बुनियादी बुनियादी ढांचे के लिए फंडिंग में लगातार कटौती देखी जा रही है। इस असंतुलन ने कई सामाजिक वैज्ञानिकों और नीतिगत विशेषज्ञों को सवाल उठाने पर मजबूर किया है: क्या राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ाने के नाम पर आम नागरिकों की बुनियादी आवश्यकताओं को दरकिनार किया जा रहा है?

सामाजिक असमानता की दृष्टि से देखें तो, ऐसा कहा जा सकता है कि बड़े शहरों में अत्याधुनिक हवाई अड्डे और रक्षा संस्थान बनते रहेंगे, जबकि दूरदराज के गांवों में अभी भी साफ़ पानी, स्वास्थ्य केंद्र और बुनियादी विद्यालयों की कमी है। प्रशासन का यह दोहरा मानक कोई नई कहानी नहीं है, परन्तु नई प्रौद्योगिकी की खरीद के सामने यह अधिक स्पष्ट हो गया है।

केंद्रीय तथा राज्य स्तर पर कई महाविद्यालयों और सरकारी अस्पतालों की निधि अनिश्चितकालिक रूप से घटती जा रही है, जबकि रक्षा उत्पादन के लिए विशेष प्रोत्साहन पैकेज लगातार बढ़ाए जा रहे हैं। नीति निर्माताओं का यह ढाल‑भंग किया गया ‘सुरक्षा‑प्राथमिकता’ की कथा, सार्वजनिक जवाबदेही के सिद्धांत को चुनौती देती है।

नागरिक समाज ने इस दिशा‑भ्रम को लेकर आवाज़ उठाना शुरू कर दिया है। कई NGOs ने बजट में पारदर्शिता और सामाजिक कार्यक्रमों के लिये न्यूनतम 30 % आरक्षित रखने की माँग की है, जिससे विकास‑पर‑सुरक्षा के संतुलन को पुनः स्थापित किया जा सके। इस बीच, सरकार की प्रतिक्रिया अक्सर शाब्दिक ‘विकास‑और‑सुरक्षा’ को एकीकृत करने की ‘विस्तृत योजना’ तक सीमित रहती है, जबकि वास्तविक कार्यान्वयन की गति धीमी बनी रहती है।

व्यंग्य यह है कि, ‘आकाश में नई पंख’ बनाते समय, जमीन पर बच्चों के आँसू ठंडी कंक्रीट की बेंचों पर गूँजते रहते हैं। यदि भारत भविष्य में भी ऐसी ही ‘ऊँची उड़ान’ भरता रहेगा, तो यह आवश्यक है कि नीति निर्माता सामाजिक न्याय को नज़रअंदाज़ करके, केवल विमान के ‘क्लॉक‑ऐंगल’ को मापते रहें। यह वही कड़वी सच्चाई है, जिसे जनता अब नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती।

Published: May 3, 2026