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Category: समाज

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विदेशी यात्रा के बाद भारत में अनभिज्ञता: सामाजिक असमानता और प्रशासनिक असंतुलन

इब्न‑बत्तूता के शब्द—“यात्रा आपको हजारों अजनबी स्थानों में घर बनाती है, फिर अपने ही देश को अनजाने बनाती है”—अब केवल इतिहासकारों के लिये नहीं रहे। भारतीय युवाओं, कुशल श्रमिकों और छात्र-विदेशियों की आव्रजन‑परत के बढ़ते प्रवाह के साथ यह उद्धरण सामाजिक विमर्श का केंद्रीय बिंदु बन गया है।

शिक्षा‑अधारित ऑक्सीजन से वंचित ग्रामीण क्षेत्रों से निकले छात्र, या सीमांत समुदाय के कामगार जो विदेश में रोजगार की तलाश में निकलते हैं, अक्सर “घर” की सीमाओं को पुनःपरिभाषित कर लेते हैं। विदेशी देशों में काम करते समय मिलने वाला सम्मान, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य‑सेवा और मानसिक संतुलन, भारत में लौटते ही धुंधला सा रह जाता है। इस संक्रमण का सबसे गंभीर पहलू मनोवैज्ञानिक असंतुलन है; कई बार यह ‘विदेशी-शोक’ नामक एक अनोखी अवस्था में बदल जाता है, जहाँ पुनरुद्धार के लिये कोई सरकारी ढांचा नहीं मिलता।

संतोषजनक उत्तर नहीं मिलने पर नियोक्ता‑से‑कर्मचारी संबंध में विश्वास का क्षरण, पारिवारिक तनाव और सामाजिक बहिष्कार की कड़ियों का निर्माण होता है। परन्तु इस बढ़ते संकट पर शासन की प्रतिक्रिया अक्सर ‘स्लाइड‑शो’‑बर्बादी तक सीमित रहती है। एकतरफ़ा योजनाएँ, जैसे “विदेशी प्रवासियों के लिये पुनर्वास फंड” या “विदेशी श्रमिक पोर्टल” के बारे में घोषणाएँ, वास्तविक रूप से जमीन‑पर नहीं पहुँचतीं। न तो पर्याप्त मनोवैज्ञानिक कंसल्टिंग केंद्र स्थापित किए गए हैं, न ही नक़दी सहायता के लिये समयबद्ध तंत्र तैयार है।

बीता कुछ सालों में, कई राज्यों ने “विदेशी लौटे प्रवासियों के लिये स्वास्थ्य बीमा” का वादा किया, परंतु कवरेज केवल संक्षिप्त अवधि तक सीमित रह गया, जिससे कई रोगियों को अंततः निजी अस्पतालों में महँगा इलाज करना पड़ा। इसी प्रकार, शिक्षा क्षेत्र में विदेशी अनुभवों को मान्यता देने के लिये “क्रेडिट ट्रांसफ़र” प्रक्रिया को सरल बनाने की बात की गई, परंतु अक्सर दस्तावेज़ीकरण की उलझी हुई प्रक्रिया के कारण लाभार्थी ही नहीं पहुँच पाते।

स्थिति को बदलने के लिये केवल मंच‑भाषण और लाल बैनर पर्याप्त नहीं। आवश्यक है कि केंद्र‑राज्य स्तर पर एक सुदृढ़ “परिचय‑पुनरुद्धार” ढांचा तैयार किया जाये, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता, मनोवैज्ञानिक, और पुनर्वास एजेंसियों का समन्वय हो। साथ ही, प्रवासियों के लिये “डिजिटल लौटने की प्रोफ़ाइल” बनाकर, उनके विदेश में अर्जित कौशल को स्थानीय उद्योग में सम्मिलित करने के लिये प्रोत्साहन योजना शुरू की जानी चाहिए।

यदि प्रशासन केवल “भ्रमण की सुंदरता” को सराहते रहेंगे, परंतु उसकी निरंतरता में उत्पन्न “घर‑से‑विच्छेद” को सुलझाने में विफल रहेंगे, तो यह उद्धरण यथार्थ में व्यंग्य बन जाएगा—‘वह यात्रा जो घर बनाती है, वह ही वह है जो घर को अनजा बना देती है।’

Published: May 7, 2026