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विदेशी पढ़ाई में भारतियों की बेघर समस्या – विश्वविद्यालयों की देखभाल में खाई
ऑस्ट्रेलिया के एक प्रमुख विश्वविद्यालय के परिसर में रहने वाले एक भारतीय छात्र, जिसका नाम रोहित शर्मा था, हाल ही में बेघरता की दहलीज पर खड़ा पाया गया। यह घटना तब उजागर हुई, जब स्थानीय मीडिया ने उसके जीवन की कठिनाइयों को रेखांकित किया। रोहित, जो सालों से अपना शैक्षणिक करियर उन्नत करने के लिए विदेश गया था, अब सतही आश्रयों, सामुदायिक आश्रय गृह और कभी‑कभी सड़कों पर ही सो रहा है।
यह मामला केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रणालीगत विफलता को दर्शाता है। कई भारतीय छात्रों ने विदेश में पढ़ाई के दौरान आर्थिक कठिनाइयों, काम‑काज़ की कमी, और बिचौलियों द्वारा दबाव का सामना किया है, फिर भी उनके द्वारा चुने गए विश्वविद्यालयों से उचित देखभाल और सहायता मिलने की उम्मीद नहीं रखी जा सकती। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी घटनाओं को रोकने की नीति मौजूद है, परंतु कार्यान्वयन में बड़ी खामियां दिख रही हैं।
वर्तमान में, कई विश्वविद्यालयों ने अपने अंतर्राष्ट्रीय छात्र समर्थन केंद्रों को सीमित कर्मचारी और बजट दे कर उनका अस्तित्व ढीला कर दिया है। जब छात्रों को आवासीय कठिनाइयों से जूझना पड़ता है, तो वे अक्सर अपर्याप्त परामर्श या अस्थायी समाधान जैसे कि “इमरजेंसी हॉस्टल” तक ही सीमित रह जाते हैं, जो कि दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। इसके अलावा, कुछ संस्थाओं ने छात्र वीज़ा की वैधता से जुड़ी जटिल प्रक्रियाओं को सरल बनाने में लापरवाही बरती है, जिसके कारण छात्रों को वैध रूप से काम करने की अनुमति नहीं मिल पाती और आर्थिक संकट में पड़ जाते हैं।
समुदायवादी संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर आवाज़ उठाते हुए कहा, “यदि हम आज रोहित जैसे छात्र को देख रहे हैं, तो कोई भी फिर से विश्वास नहीं कर पाएगा कि विदेशी विश्वविद्यालयों की देखभाल हमारे छात्रों की सुरक्षा की गारंटियां देगी।” यह टिप्पणी प्रणाली की निरंतर असफलता को उजागर करती है, जहाँ “समुदाय की दोहरी देखभाल” की अवधारणा व्यर्थ प्रतीत होती है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया में अभी तक कोई ठोस कदम नहीं देखा गया है। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने हाल ही में एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि “हम सभी अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की भलाई के लिए प्रतिबद्ध हैं और मौजूदा प्रोटोकॉल में निरंतर सुधार लाएंगे।” हालांकि, ऐसी घोषणायें अक्सर खंडित संसाधनों और पेपरवर्क में उलझी रह जाती हैं, जिससे वास्तविक सहायता पहुँचाना सम्भव नहीं हो पाता।
यह घटना भारतीय छात्रों के लिए एक चेतावनी बत्ती बन सकती है। छात्र संगठनों ने सरकार से कई मांगें रखी हैं: अंतरराष्ट्रीय छात्र सहायता के लिए विशेष निधि, विश्वविद्यालयों को अनिवार्य रूप से “आवासीय सुरक्षा योजना” अपनाने का आदेश, और विदेशी संस्थानों के साथ विस्तृत समझौते ताकि छात्रों को वीज़ा, स्वास्थ्य बीमा और आर्थिक सहायता का स्पष्ट मार्गदर्शन मिल सके।
एक पक्ष में, यह स्पष्ट है कि शिक्षा का वैश्विक प्रवाह न केवल शैक्षणिक अवसर लाता है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की नई चुनौतियों को भी प्रस्तुत करता है। यदि इन चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया, तो बेघरता जैसी दुखद वास्तविकता, जो रोहित शर्मा के सिर पर छाई थी, भविष्य में भी अनेक भारतीय छात्रों के साथ दोहराई जा सकती है। इस सिलसिले को तोड़ने के लिए नीतियों में ठोस बदलाव, प्रशासनिक तत्परता और समुदाय की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।
Published: May 7, 2026