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Category: समाज

विदेशी धार्मिक शिक्षा संस्थान में रब्बी कार्यक्रम बंद, भारतीय शैक्षिक नीति पर उठते सवाल

अमेरिका के सबसे पुराने यहूदी धर्मशास्त्रीय संस्थान ने अपने सेंट्रोसिटि परिसर में रब्बी पाठ्यक्रम को समाप्त कर दिया। इस कदम ने न केवल वह समुदाय जो इस शिक्षा पर निर्भर था, बल्कि भारत सहित विश्वभर के भारतीय मूल के छात्रों को भी आश्चर्यचकित कर दिया, जो अक्सर ऐसी संस्थाओं में विदेशी शैक्षिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तलाश में रहते हैं।

सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और भारत में कई युवा छात्रों ने इस संस्था को उत्तरी अमेरिकी धार्मिक शिक्षा के मानक के रूप में चुना था, विशेषकर उन पाठ्यक्रमों के लिए जो अल्पसंख्यक अधिकारों और सामाजिक समानता पर प्रकाश डालते हैं। रब्बी कार्यक्रम के बंद होने से इन छात्रों के शैक्षणिक मार्ग में निरंतरता का अभाव उत्पन्न हो रहा है, जबकि भारत में मौजूद समान समस्याएँ—कम बजट, प्रशासनिक अनियमितताएँ, तथा नीति‑क्रियान्वयन की धीमी रफ्तार—पर प्रकाश डालते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की अचानक शैक्षणिक बंदी अक्सर नियामक संस्थानों की बेबसी या वित्तीय असहायता का प्रतिबिंब होती है। जबकि अमेरिकी संस्थान ने बजट कटौती और कम नामांकन को कारण बताया, भारतीय बहु‑विश्वविद्यालय मॉडल में समान कारण अक्सर अनदेखी नीति‑निर्णय, अनिर्धारित अनुदान, और नियामक अड़चनें बन जाते हैं। इस प्रकार, विदेशी संस्थानों की अकारण बंदी, देश में समान शैक्षणिक असंतुलन को उजागर करती है।

समुदाय की प्रतिक्रिया गर्म है। कई अभिभावकों ने कहा कि इस बंदी ने उनके बच्चों के भविष्य में गंभीर असुरक्षा पैदा कर दी है, क्योंकि इस तरह की विशेषीकृत शिक्षा को भारत में उचित वैकल्पिक नहीं मिल रहा। इसके अलावा, यह कदम अल्पसंख्यक धार्मिक शिक्षा की स्थिरता पर व्यापक प्रश्न उठाता है—क्या सरकारें ऐसे संस्थानों को सुदृढ़ करने के लिए पर्याप्त सहारा दे रही हैं, या यह केवल आर्थिक बोज़ का बहाना बनाकर सामाजिक हितैषी कार्यक्रमों को बंद करने का एक नया तरीका है?

जब प्रशासन इस निर्णय का समर्थन करता है, तब वह अक्सर “व्यावसायिक वास्तविकता” के मुद्दे को सामने लाता है। परंतु यह व्याख्या, विशेषकर जब सार्वजनिक निधियों की बात आती है, तो एक सूखी व्यंग्य बन जाती है: बजट की तीन बत्ती जलाकर मोमबत्ती के उजाले में ज्ञान को मंद करने की नीति। इस प्रकार, शिक्षा के नाम पर किए गए छोटे‑छोटे कटौतियों का सामूहिक परिणाम बड़े सामाजिक असमानताओं में बदल जाता है।

इसी बीच, भारतीय नीति निर्माताओं को यह विचार करना चाहिए कि विदेश में होने वाली इस तरह की शैक्षणिक व्यवधान को भारतीय संदर्भ में दोहराया न जाए। अल्पसंख्यक शिक्षा के लिए स्पष्ट बजट, नियामक सहयोग, तथा शिक्षण संस्थानों के लिए दीर्घकालिक योजना बनाकर ही इस धारा को स्थिर किया जा सकता है। नहीं तो, अन्य विदेशी संस्थानों की बराबरी वाली “बंदी” की आवाज़ें जल्द ही हमारे अपने विश्वविद्यालयों में भी गूँजने लगेंगी।

Published: May 6, 2026