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Category: समाज

विदेशी जलप्रपात‑सम्पन्न राष्ट्रीय उद्यानों के प्रचार से उजागर भारत की प्रकृति‑नीति की खामियाँ

हाल ही में दक्षिण अमेरिकी पाँच विशिष्ट राष्ट्रीय उद्यानों – जहाँ झरने, वन्यजीव और बेमिसाल वनस्पति के साथ प्रकृति अपनी पूर्ण अभिव्यक्ति दिखाती है – के बारे में बहुराष्ट्रीय पर्यटन एजेंसियों ने व्यापक प्रचार‑प्रसार किया। इस तथ्य ने भारत में प्रकृति प्रेमियों, छात्रों और मध्यम वर्गीय परिवारों के बीच एक प्रश्नचिह्न उत्पन्न किया: जब विदेशों में ऐसी ‘वाइल्डनेस’ के आकर्षण को सहजता से प्रदर्शित किया जा रहा है, तो हमारे देश की वन, जलवायु और पर्यटन नीतियों में क्या कमी है?

भारत में कई राष्ट्रीय उद्यानों में भी झरने और विविध जीव-जन्तु मौजूद हैं, परन्तु उनकी पहुँच, बुनियादी सुविधाएँ और पर्यटकों के लिए सुरक्षा व्यवस्था अक्सर अधूरी रह जाती है। कई बार स्थानीय समुदायों को संरक्षण‑कार्यक्रमों में उचित पार्टनरशिप नहीं दी जाती, जिससे बुनियादी जीवन समर्थन पर दबाव बना रहता है। इस संदर्भ में वन विभाग एवं पर्यटन मंत्रालय की प्रतिक्रिया केवल सतही योजना दस्तावेज़ों तक सीमित रह गई, जबकि ऑन‑ग्राउंड कार्यान्वयन में अभाव स्पष्ट है।

पर्यावरणीय स्वास्थ्य, जलसंसाधन प्रबंधन और शहरी लोगों के मानसिक कल्याण पर इन नीतियों का प्रभाव अनदेखा नहीं किया जा सकता। विज्ञान के अनुसार, प्राकृतिक परिवेश में समय बिताना तनाव घटाता है, शारीरिक फिटनेस बढ़ाता है और बच्चों में प्राकृतिक विज्ञान की समझ को प्रोत्साहित करता है। फिर भी, बजट आवंटन में अक्सर बुनियादी अवसंरचना के बजाय विज्ञापन खर्च को प्राथमिकता दी जाती है, जो कि व्यंग्यात्मक रूप में कहा जा सकता है कि ‘प्रकाशन में तो जलप्रपात हैं, पर पृथ्वी पर नहीं।’

हालिया सार्वजनिक बहस में नागरिक समूहों ने सरकारी नीतियों की पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग की। उन्होंने कहा कि यदि विदेशी उद्यानों के प्रचार को प्राथमिकता दी जा रही है, तो क्या हमारा अपना प्राकृतिक धरोहर भी उसी स्तर पर प्रदर्शित करने के लिए तैयार है? इस परन्तु अब तक कोई ठोस नीति‑समीक्षा नहीं हुई है, केवल सतही ‘एक्स्प्लोर इंडिया’ रणनीति ही सामने आई है।

समग्र रूप से देखा जाए तो विदेशी उद्यानों की प्रशंसा हमारे लिए एक दोधारी तलवार बन गई है – यह दर्शाती है कि प्रकृति पर्यटन में आर्थिक संभावना है, परन्तु यह साथ ही भारत की वर्तमान वन‑पर्यटन ढाँचा को भी संदेह के आवरण में डालती है। प्रशासनिक चूक के निरंतर सलमाने के बिना, भविष्य में स्वच्छ जल, जैव विविधता संरक्षण और जनस्वास्थ्य का लाभ उठाना कठिन रहेगा।

Published: May 6, 2026