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Category: समाज

वृद्धों में डिजिटल गेमिंग की लत: पारिवारिक सम्बन्धों पर दबाव और नीतिगत चौराहे

भारत के कई घरों में अब तकनीकी प्रगति के साथ एक नई सामाजिक जाँच आई है – 70‑वर्षीय वरिष्ठ नागरिकों द्वारा घंटों तक वीडियो‑गेम्स में व्यस्त रहना। एक वरिष्ठ महिला, जो दशकों से कंप्यूटर, लैपटॉप और अब स्मार्टफोन पर टेट्रिस, सॉलिटेयर और स्लॉट‑गेम्स खेलती हैं, अपने परिवार के साथ संवाद की जगह स्क्रीन को छूकर ही रह जाती हैं। यह व्यक्तिगत कहानी कई परिवारों में दोहराती हुई दिखती है, जहाँ बुजुर्गों की डिजिटल लत ने पारिवारिक बंधनों को धुंधला कर दिया है।

डिजिटल लत को अक्सर युवा वर्ग की समस्या मानते आए हैं, पर हाल के सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 60 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग में भी इस विमुक्ति के संकेत स्पष्ट हैं। सामाजिक अलगाव, अवसाद या अनसुलझे दर्द को कम करने की कोशिश में ये व्यक्ति गेमिंग को मनोवैज्ञानिक सुरक्षा कवच समझते हैं। जबकि यह अस्थायी राहत देता है, दीर्घकालिक प्रभावों में सपनों की गुणवत्ता घटना, आँखों की थकान, मोटर कौशल में गिरावट और सबसे बड़ी बात – भावनात्मक सम्बन्धों का क्षरण शामिल है।

परिवार के सदस्य अक्सर कहते हैं कि ‘माँ का फोन हमेशा हाथ में रहता है, चाहे हम बात कर रहे हों’। यह न केवल संवाद के अवसरों को घटाता है, बल्कि वृद्धावस्था में सामाजिक समर्थन की आवश्यकता को भी कमजोर करता है। कई बार यह समस्या मजाक बनकर निकलती है, लेकिन अंत में अवसाद या एकाकीपन की गहरी जड़ें छिपी होती हैं, जिन्हें अक्सर स्वास्थ्य प्रणाली में जगह नहीं मिल पाती।

संतुलित नीति‑निर्धारण की बात करें तो, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) एवं आयुर्वृद्ध देखभाल योजनाओं में डिजिटल लत पर विशेष ध्यान देना अभी भी अधूरा है। सरकार ने डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें शुरू की हैं, पर यह अक्सर यह मान कर चलती है कि एक बार साक्षरता हासिल हो जाने से ही लाभ होगा, जबकि लत के जोखिम को नज़रअंदाज़ कर देती हैं। प्रशासनिक जवाबदेही की कमी स्पष्ट हुई है: न तो कोई विशिष्ट स्क्रीनिंग टूल उपलब्ध है, न ही वृद्धावस्था में गेमिंग के संभावित दुष्प्रभावों को लेकर कोई जागरूकता अभियान चलता है।

निवारण के लिए कई उपाय संभावित हैं – सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में ‘डिजिटल डिटॉक्स’ कार्यशालाओं का आयोजन, परिवारों को सशक्त बनाने के लिए काउंसलिंग सत्र, तथा टेली‑हेल्थ सेवाओं के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य जांच का नियमितकरण। साथ ही, मोबाइल ऑपरेटरों और गेमिंग प्लेटफ़ॉर्म को उपयोग के समय सीमा और उम्र‑आधारित प्रतिबंध लागू करने की दिशा में विनियमों की आवश्यकता है।

व्यवहारिक रूप से, परिवार के भीतर संवाद को पुनर्स्थापित करने के लिए स्क्रीन‑फ़्री अवधि, संयुक्त खेल‑सत्र या गप्प‑बात के समय तय करना मददगार हो सकता है। पर ये कदम तभी असरदार होंगे जब सामाजिक संरचना, स्वास्थ्य विभाग और तकनीकी उद्योग मिलकर एक समग्र ढांचा तैयार करें, जहाँ ‘डिजिटल उपयोग’ का अर्थ सिर्फ़ मनोरंजन नहीं बल्कि व्यक्तिगत कल्याण भी हो।

जैसे ही भारत में उम्रदराज़ जनसंख्या बढ़ रही है, डिजिटल लत के सामाजिक परिणाम भी अधिक स्पष्ट हो रहे हैं। अगर नीति‑निर्माताओं ने केवल तकनीकी पहुँच ही नहीं, बल्कि उसका नैतिक‑स्वास्थ्य प्रभाव भी देखना शुरू किया, तो परिवारों को इस नई लत से लड़ने में असली मदद मिल सकेगी। वर्तमान में, जहाँ प्रशासनिक मनोविज्ञान को अक्सर झुके हुए दस्तावेज़ीकरण में ढंका जाता है, वहाँ जरूरत है एक ठोस, मानव‑केन्द्रित दृष्टिकोण की, जो बुजुर्गों को स्क्रीन के पीछे नहीं, बल्कि अपने रिश्तों की कूटनीति में फिर से रखे।

Published: May 3, 2026