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Category: समाज

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वृद्ध देखभाल पर खुली बात: एक कॉलेज पोडकास्ट ने स्मृति‑भ्रांति और मृत्यु को किया सार्वजनिक

एक भारतीय विश्वविद्यालय के छात्र‑समूह ने हाल ही में राष्ट्रीय कॉलेज पोडकास्ट प्रतियोगिता में जीत हासिल की, जहाँ उन्होंने दादा‑दादी को संबोधित एक पत्र‑रूप पोडकास्ट तैयार किया। यह रचना सिर्फ कलात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक‑स्वास्थ्य मुद्दे—वृद्धावस्था, डिमेंशिया (स्मृति‑भ्रांति) और मृत्यु—पर खुली बातचीत को प्रोत्साहित करती है।

भारत में 60 वर्ष से ऊपर की जनसंख्या 2025 तक 10 % से अधिक तक पहुँचने का अनुमान है, और डिमेंशिया के रोगी लगभग पाँच प्रतिशत तक पहुँच रहे हैं। फिर भी इस वर्ग को अक्सर स्वास्थ्य‑सेवा, सामाजिक पहचान और आर्थिक सुरक्षा में दोहरी असमानता का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञों की पहुँच सीमित है, जबकि शहरी क्षेत्रों में भी बुनियादी देखभाल सुविधाओं की कमी नज़र आती है।

पॉडकास्ट ने इस परिप्रेशित परिदृश्य को व्यक्तिगत कथा के माध्यम से उजागर किया। छात्र‑सर्जक ने अपने दादा‑दादी के साथ रोज़मर्रा की कठिनाइयों, स्मृति‑भ्रांति के लक्षण, और जीवन‑समाप्ति के डर को एक पत्र के रूप में कहा, जिससे सुनने वालों को आत्मीयता के साथ‑साथ असहज सत्य का सामना करने का अवसर मिला।

शिक्षा संस्थानों की भूमिका इस बात में स्पष्ट हो गई कि युवा वर्ग नई मल्टी‑मीडिया तकनीकों के ज़रिए सामाजिक समस्याओं को कैसे सामने लाता है। हालांकि, यही मंच प्रशासनिक उदासीनता की आलोचना का भी प्रतिविंब बन गया। मौजूदा वृद्ध‑सेवा नीतियों में अक्सर जागरूकता अभियानों, सामुदायिक समर्थन नेटवर्क और सशक्त देखभाल के लिए बजट आवंटन की कमी देखी जाती है। इस पोडकास्ट ने भारत के प्रगतिशील राज्यों की तुलना में कई क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के कार्यान्वयन में अंतर को रेखांकित किया।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवादात्मक प्रोजेक्ट्स को सरकारी पहल के साथ मिलाकर ही वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, राष्ट्रीय स्तर पर डिमेंशिया‑सेंटर के निर्माण, वार्धक्य‑परामर्श में ग्रामीण हेल्थ कर्मियों का प्रशिक्षण, और सार्वजनिक स्थानों पर स्मृति‑भ्रांति पहचान संकेतकों की स्थापना आवश्यक होगी। बिना ऐसी ठोस नीतियों के केवल सामाजिक चेतना का निर्माण अधूरा रह जाएगा।

जैसे ही इस पोडकास्ट को राष्ट्रीय मंच मिला, यह न केवल छात्रों की रचनात्मक क्षमता का प्रमाण है, बल्कि यह संकेत देता है कि युवा वर्ग सार्वजनिक चर्चा में परिवर्तनकारी भूमिका निभा रहा है। अब सरकार से अपेक्षा है कि वह इन आवाज़ों को केवल सराहना नहीं, बल्कि वास्तविक नीति‑निर्धारण में समाहित कर, वृद्धावस्था और डिमेंशिया से जुड़ी प्रणालीगत खामियों को समाप्त करने की ठोस कार्रवाई करे।

Published: May 7, 2026