वेतन नहीं, मान्यता की कमी से टॉप टैलेंट कंपनियों को छोड़ते हैं
एक वर्गीकृत उदाहरण में, दो वर्षों तक निरंतर उच्च प्रदर्शन करने वाले कर्मचारी को केवल मामूली वेतन वृद्धि और प्रशंसा‑रहित वातावरण का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके कि उसने निरंतर लक्ष्य‑से‑ऊपर काम किया, कंपनी ने न तो प्रशंसा की कोई औपचारिक व्यवस्था रखी और न ही उसके योगदान को मापने वाले स्पष्ट मानदंड पेश किए। अंततः, जब उसे अचानक बड़े पैमाने पर वेतन वृद्धि का प्रस्ताव मिला, तो वह पहले ही उस प्रतिस्पर्धी फर्म में शामिल हो चुका था, जिसने उसे जल्द ही सराहा।
यह छोटा‑सा केस भारतीय कार्यबल में गहराई से जमा उदासीनता को उजागर करता है। कई बड़े‑छोटे उद्यमों में ‘हाई‑परफॉर्मर’ कहलाने वाले कर्मचारियों को अक्सर केवल आँकड़ों के रूप में देखा जाता है—उनके वास्तविक भावनात्मक और व्यावसायिक संतोष को नज़रअंदाज़ किया जाता है। जब तक मान्यता की प्रणाली न स्थापित हो, वेतन वृद्धि केवल ‘अंतिम उपाय’ बनकर रह जाती है, जो अक्सर देर से आती है।
ऐसे माहौल में, न केवल कंपनी की उत्पादकता घटती है, बल्कि सामाजिक असमानता भी गहरी होती है। उचित पारिश्रमिक और प्रशंसा की कमी से मध्य‑वर्ग की आर्थिक स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगता है—क्योंकि उच्च प्रदर्शनकर्ता ही वह शक्ति हैं, जो नवाचार और प्रतिस्पर्धात्मक लाभ ला सकते हैं। उनकी निरंतर असंतुष्टि से नौकरियों का ‘ब्रेन ड्रेन’ बन जाता है, जो राष्ट्रीय आर्थिक विकास को भी प्रभावित करता है।
नियामक संस्थानों ने इस दिशा में कई नीति‑निर्देश जारी किए हैं, पर उनका कार्यान्वयन अक्सर क्लासरूम की उध्वस्त पाठ्य‑पुस्तकों जैसा है—कागज़ पर तो मौजूद, पर वास्तविकता में नहीं। कंपनियों को अब सख्त रिपोर्टिंग, पारदर्शी वेतन ढाँचा और नियमित मान्यता कार्यक्रम लागू करने का आदेश दिया जाना चाहिए, ताकि ‘भुगतान‑पहले‑पहले‑केवल’ के मिथक को तोड़ सकें।
व्यावसायिक जगत में अब केवल “सर्टिफ़ाइड सैलरी” की नहीं, बल्कि “सर्टिफ़ाइड सैल्यूटेशन” की भी माँग बढ़ी है। यदि प्रशासन और नीति निर्माताओं ने इस अभाव को पहचाना, तो न केवल कर्मचारी‑रिटेंशन सुधरेगा, बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक स्थिरता के लिये भी मजबूत आधार स्थापित होगा।
Published: May 4, 2026