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Category: समाज

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वित्तीय अंतराल से बंद हो रहा जेल निरीक्षण विभाग, कारावास में मौतें लगातार बढ़ रही हैं

केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत जेल निगरानी कार्यालय, जो दीर्घकालिक कारावास, स्वास्थ्य देखभाल और आत्महत्या मामलों की जाँच करता था, अब मौद्रिक बाधाओं के कारण धीरे‑धीरे बंद हो रहा है। इस विभाग की स्थापना मूलतः बंदियों के जीवन स्तर की रक्षा, उनके स्वास्थ्य अधिकार सुनिश्चित करने तथा कारावास में अनुचित व्यवहार की रोकथाम के लिए की गई थी।

हाल ही में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में हिरासत में रहने वाले बंदियों की औसत अवधि लगभग 30 % बढ़ी है, जबकि जेलों में हुई अप्रत्यक्ष मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस बीच, वित्तीय आवंटन में व्यवधान के कारण निगरानी कार्यालय के प्रमुख कर्मचारियों को अवकाश‑भत्तों की प्राप्ति नहीं हो पा रही, जिससे कई महत्वपूर्ण जांच प्रलंबित रह गई हैं।

प्रशासन की ओर से यह कहा गया है कि बजट में देरी ‘तकनीकी कारणों’ से उत्पन्न हुई, परन्तु यह स्पष्ट नहीं कि यह एक बार की गड़बड़ी है या नीति‑निर्धारण में गहरी अड़चन। जबकि जनता के कल्याण के नाम पर कई सामाजिक नीतियों का जिक्र किया गया है, इस विभाग के निरंतर कार्य को बाधित करना मूलभूत मानवाधिकारों के उल्लंघन का संकेत देता है।

विखंडित होने वाले इस निगरानी तंत्र से न केवल संभावित कानूनी उल्लंघनों को रोकने वाला एक महत्त्वपूर्ण नियंत्रण निकाय हट रहा है, बल्कि उन परिवारों को भी निराशा का सामना करना पड़ेगा, जिनके सदस्य जेल में स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य देखभाल की अनुपलब्धता, कुपोषण और मानसिक दमन की रिपोर्टें पहले से ही बढ़ रही थीं; अब इन चुनौतियों के समाधान के लिए एक प्रमुख संस्थान ही नहीं बचा।

समाज से अपेक्षा की जाती है कि वह इस मुद्दे को सार्वजनिक मंच पर लाए और प्रशासन को जवाबदेह बनाए। यदि वित्तीय अंतराल को उचित संकल्प के बजाय ‘पुनः मूल्यांकन’ का बहाना बनाकर इस तरह की संस्थाओं को क्रमशः समाप्त किया जाता रहा, तो मौजूदा सामाजिक असमानता और अधिकार‑विचलन की गाथा केवल गहराती जाएगी।

Published: May 8, 2026