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विजय की राजनैतिक उछाल ने नेेट पर तमिलनाडु के विरोध को नहीं बदला
तमिलनाडु में एक फिल्मी चेहरा से राजनैतिक मंच पर कदम रखकर विजय ने चुनावी धाकड़ प्रदर्शन दिखाया, परन्तु इस निरंतर जोश ने राज्य की शैक्षणिक नीति में निहित गहरी टक्करों को धुंधला नहीं किया। राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NEET) के विरुद्ध वह समान विचारधारा, जो पहले से ही कई पॉलिटिशियन में व्याप्त थी, अब भी ठहराव में है।
राज्य भर के कई दलों के नेता, चाहे वह ड्रमर हो या विपक्षी, सार्वजनिक मंच पर यह वादाकार करते रहते हैं कि नेेट ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को ‘पंख काटता’ है। इन बयानबाज़ियों की पृष्ठभूमि में उच्चतम साक्षरता दर के बावजूद सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटों का अभाव, और ग्रामीण विद्यालयों में बुनियादी प्रयोगशाला सुविधाओं की कमी है। यह तथ्य अब भी नीति निर्माताओं की ‘न्यायसंगत’ परीक्षा के सिद्धांतों के साथ टकराव में है।
केन्द्रीय सरकार ने नेेट को ‘समान और मेरिट‑आधारित’ प्रणाली बताया है, परन्तु तमिलनाडु की प्रशासनिक इकाइयाँ इस सिद्धांत को अपनाने में लाचारी दिखा रही हैं। सतत रूप से पुरानी शैक्षणिक बुनियादी ढांचा, अपर्याप्त काउंसिलिंग समर्थन और अभिभावकों के लिये सूचना तक पहुँच की कमी, इस बात का संकेत देते हैं कि नीति का क्रियान्वयन केवल कागज़ी रूप में अस्तित्व में है।
विजय के उदय ने इस वादे को तोड़ने की अपेक्षा नहीं रखी, बल्कि सत्ता में नई गतिशीलता का इशारा किया। परन्तु निरंतर एक ही नीति‑विरोधी स्वर ने यह सिद्ध किया कि तमिलनाडु की प्रशासनिक चक्रवात में नई आवाज़ें भी वही पुरानी लहरें ही दोहराती हैं। यहाँ तक कि अभिकर्ता‑संकाय के बीच ‘नीति‑स्थिरता’ के नाम पर लटकी हुई जड़ता, ग्रामीण छात्रों को एक ही पुरानी बाधा—नेेट—में फँसाए रखती है।
सार्वजनिक हित की दृष्टि से यह आवश्यक है कि केवल नेतृत्व परिवर्तन से नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से शैक्षणिक संसाधनों के पुनर्विन्यास, स्थानीय काउंसिलिंग केंद्रों की सुदृढ़ीकरण और राजकीय मेडिकल कॉलेजों में आरक्षित सीटों के विस्तृत वितरण से ही इस गतिरोध को तोड़ा जा सके। जब तक नीति‑निर्माताओं और कार्यान्वयनकर्ताओं के बीच यह ‘सूखी व्यंग्यात्मक टकराव’ निरंतर रहेगा, तमिलनाडु के ग्रामीण छात्र नेेट की कठोर लकीर के आगे झुकते ही रहेंगे।
Published: May 6, 2026