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Category: समाज

लाल खाद्य पदार्थों की दिल‑सुरक्षा पर पहुँच, सरकारी पोषण नीति की कमी उजागर

प्रकाशन में आयी नई पोषण रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि टमाटर, चुकंदर, स्ट्रॉबेरी, अनार और अन्य लाल फल‑सब्ज़ियां रक्त‑प्रवाह को बेहतर बनाकर, सूजन कम करके और कोलेस्ट्रॉल संतुलन को सुधर कर हृदय‑रोगों के खतरे को घटा सकती हैं। वैज्ञानिक तर्क के बावजूद, भारत में आम नागरिक इन पोषक तत्वों तक पहुँचने के संघर्ष में हैं।

देश के बड़े हिस्से में जहाँ मध्यम वर्ग की आय सीमित है, वहीं सार्वजनिक खाद्य वितरण प्रणाली—पीओएसएचण अभियान, मध्याह्न भोजन योजना—अभी भी हरे‑भरे सलाद और चावल‑दाल पर केंद्रित है, जबकि लाल खाद्य पदार्थों को मेन्यू में जगह नहीं मिल पाती। परिणामस्वरूप, ग्रामीण और शहरी गरीब वर्ग दोनों को हृदय‑सम्बन्धी रोगों की बढ़ती दर का सामना करना पड़ रहा है।

वेलनेस विशेषज्ञों के अनुसार, रोज़ाना सिर्फ़ एक कप चुकंदर का रस या थोड़ी मात्रा में टमाटर की चटनी ही रक्त‑शर्करा को स्थिर रख सकती है तथा ‘एल्डरबर्ग’ नामक एंटी‑ऑक्सीडेंट को सक्रिय कर हृदय‑धमनी प्रणाली को सुरक्षित कर सकती है। लेकिन जब अस्पताल के वार्ड में रोगियों की लकीरें चमकीले लाल रंग की नहीं, बल्कि धुंधली श्वेत‑फिक्के रह जाती हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि नीतिगत असफलताएँ ही इस बाबत की मुख्य बाधा हैं।

सार्वजनिक प्रतिक्रिया में यह भी कहा गया है कि सरकारी भोजनालयों में “टमाटर के बजाय पानी ही परोसना” अब एक व्यंग्यात्मक वाक्य बन गया है। कई नागरिक ने सामाजिक मीडिया पर अपनी शिकायतें दर्ज कराते हुए कहा कि रोज़मर्रा के बजट में लाल सब्ज़ियों को शामिल करना महँगा पड़ता है, जबकि किफायती, पोषक‑सम्पन्न विकल्पों को सब्सिडी नहीं दी जा रही।

पिछले वर्ष जलवायु परिवर्तन की चपेट में आई फसल‑उत्पादकता ने लाल फलों का बाजार मूल्य भी बढ़ा दिया, जिससे मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए उन्हें खरीदना कठिन हो गया। वित्त मंत्रालय ने इस पर कोई विशेष प्रोत्साहन योजना नहीं बतायी, जबकि कई राज्यों ने अब तक अपने एग्री‑मार्केट में लाल फलों को प्राथमिकता देने के लिए कोई विशेष आयाम नहीं दिया।

सम्पूर्ण तस्वीर यह है कि वैज्ञानिक साक्ष्य के बावजूद, सामाजिक‑आर्थिक बाधाएं, नीति‑भ्रष्टाचार, और वितरण में लापरवाही ने भारतीय जनता को हृदय‑रोगों के अधिक जोखिम में डाल दिया है। यदि लाल खाद्य पदार्थों को सार्वजनिक पोषण योजनाओं में समाहित किया जाए, तो न केवल रोग‑भविष्यवाणी में सुधार होगा बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य खर्च में भी कटौती संभव होगी। इस दिशा में स्पष्ट दिशा‑निर्देश और निरन्तर निगरानी की माँग अब सिर्फ़ एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकतावश अनिवार्य कदम बन चुका है।

Published: May 5, 2026