जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: समाज

लंबी समुद्री तैनाती से भारतीय नौसेना के परिवारों में बढ़ता तनाव

कोच्चि के समुद्री तट पर स्थित भारतीय नौसेना के मुख्यालय में लगभग 15,000 सैनिक और मरीन की दीर्घकालिक तैनाती से उनके घर-परिवारों की धड़ाधड़ दहलीजें थम गई हैं। भारतीय नौसैनिक पोत इंस व्लॉर की लगभग एक वर्ष से अधिक चल रही तैनाती के कारण, इस बेस की गलियों में बेसिक सुविधाओं के साथ एक नया सामाजिक मुद्दा उभर कर आया है – भाई-बहनों, बच्चों और पत्नियों की मनोवैज्ञानिक और आर्थिक संकट।

तैनाती के शुरुआती दिन में ‘देशभक्ति’ की भावना ने परिवारों को एकत्रित किया, पर आज वे 10 महीने से अधिक के इस सफ़र के बाद, निराशा की लहर में तैर रहे हैं। स्कूल में पढ़ते बच्चों को अब अक्सर अस्थायी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस‑सहायता वाले पाठ्यक्रमों के साथ झुंजना पड़ रहा है, क्योंकि अभिभावक निरंतर अनिश्चितता से बाहर नहीं निकल पा रहे। आर्थिक रूप से, असंगत वेतन भुगतान और सीमित भत्तों ने कई परिवारों को कर्ज़ की रेस में डाल दिया है।

नौसेना ने इस तैनाती को ‘रक्षक शक्ति की अनिवार्य आवश्यकता’ बताया, यह कहते हुए कि राष्ट्रीय सुरक्षा के वाणिज्यिक हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। परन्तु परिवारों ने बताया कि सूचना का प्रवाह ‘स्थिरता’ की कक्षा में नहीं है – कब और किस दिन वापसी होगी इस सवाल का उत्तर अक्सर ‘अभी निर्धारित नहीं’ के साथ ही मिलता है। इस पर “जब तक बोर्डिंग पास पर लिखा ‘वापसी कब’ नहीं होता, तब तक प्रशासन के पास जवाब नहीं” जैसा व्यंग्यात्मक टिप्पणी हवा में गूँजती है।

सरकारी पक्ष से अब तक केवल औपचारिक आश्वासन ही मिले हैं – ऑनलाइन पोर्टल पर साप्ताहिक अपडेट, तथा लघु‑समुह में परामर्श बैठकों का आयोजन। लेकिन इन पहलों को “सार-रहित” और “रोकथाम‑की‑जज्बा में जूता” कहा जा रहा है। कांग्रेस के सांसदों ने इस मुद्दे को संसद के प्रश्नकाल में उठाया, फिर भी विस्तृत कार्य‑योजना के बजाय “वर्तमान क्षितिज में सुधराव” का वादा ही किया गया।

समाज के दृष्टिकोण से यह मामला केवल एक व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि नीति‑कार्यान्वयन की बड़ी खामी को उजागर करता है। यदि सैनिकों के परिवारों को ‘सुरक्षा संरक्षक’ माना जाता है, तो उनके लिए ‘सुरक्षा सुविधा’ की गारंटी भी क्यों नहीं? इस पर गहरी चर्चा की आवश्यकता है – चाहे वह पारिवारिक समर्थन निधि की स्थापना हो, या तैनाती‑सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक सहायता केंद्रों का विस्तार।

जब तक यह प्रश्न नहीं सुलझता कि ‘लंबी तैनाती के दौरान परिवारों को किस प्रकार का अधिकार मिलता है’, तब तक भारतीय नौसेना की विश्वसनीयता भी समान समुद्र में डुबोती रहेगी।

Published: May 5, 2026