लंदन के स्कूलों में तनाव‑मुक्ति के लिए वर्चुअल रियलिटी का पायलट परीक्षण
सूटन बरो के 15 माध्यमिक विद्यालयों में एक नई पहल शुरू हुई है, जिसमें छात्रों को परीक्षा‑दबाव, ध्यान‑अभाव विकार (ADHD) और कठिन घर की स्थितियों से उत्पन्न तनाव को कम करने हेतु वर्चुअल रियलिटी (VR) हेडसेट प्रदान किए जा रहे हैं। यह प्रयोग Phase Space नामक टेक फर्म के उपकरणों को स्थानीय एनएचएस मानसिक स्वास्थ्य ट्रस्ट के सहयोग से चलाया जा रहा है।
शिक्षा क्षेत्र में तनाव के मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर लगातार आवाज़ें उठती रही हैं, पर अधिकांश समाधान केवल शब्दों तक सीमित रह जाते हैं। इस पायलट में छात्रों को 10‑15 मिनट की निर्देशित वर्चुअल सत्रों के माध्यम से श्वास‑व्यायाम, मनोवैज्ञानिक दृश्यों और तनाव‑निवारक तकनीकों से परिचित कराया जाता है। प्रारम्भिक प्रतिक्रिया सकारात्मक दिखी है—छात्रों ने बताया कि इंटरैक्टिव माहौल उन्हें वास्तविक कक्षा के शोर‑शराबे से अलग रखने में मदद करता है।
परंतु यह प्रयोग सिर्फ तकनीकी नवाचार नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता एवं प्रशासनिक अंतराल को उजागर करता है। भारत में भी स्कूलों के लिए मानसिक‑स्वास्थ्य सुविधाएँ अक्सर अधूरी हैं; जहाँ एकत्रित बजट में शब्दों का अधिक खर्च और वास्तविक कार्यान्वयन में देरी आम बात है। लंदन के इस प्रोजेक्ट में एनएचएस ट्रस्ट की सक्रिय भागीदारी दिखाती है कि स्वास्थ्य‑शिक्षा एकीकरण के लिए जमीनी स्तर पर सहयोगी तंत्र मौजूद हो सकते हैं—वहँ भी, जब तक नीति‑निर्माताओं को अस्थायी फंडिंग और दीर्घकालिक योजना दोनों की आवश्यकता नहीं समझ आती, ये पहलें केवल प्रयोगात्मक ही रहेंगी।
पायलट की सीमा अभी भी समय‑सीमित है, और यह प्रश्न बाकी रहता है कि जब ये 15 स्कूल इस मॉडल को अपनाते हैं, तो नगर के अन्य शैक्षिक संस्थानों—जिनके पास तकनीकी संसाधन या प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक नहीं—के साथ समानता कैसे स्थापित होगी। यदि इस प्रकार के उपकरण को व्यापक रूप से लागू किया जाना है, तो न केवल वित्तीय बजट, बल्कि प्रशिक्षु शिक्षकों की क्षमता निर्माण में भी निवेश आवश्यक है।
वर्तमान में, लंदन नगरपालिका ने इस प्रयोग को ‘शिक्षा‑स्वास्थ्य एकीकरण का मॉडल’ घोषित किया है, पर यह घोषणा अक्सर उन बड़ी समस्याओं को छुपा देती है जिनका सामना कई भारत के छात्रों को करना पड़ता है: तनाव‑ग्रस्त कक्षा, अपर्याप्त काउंसलिंग, और सामाजिक‑आर्थिक अंतराल। इस पायलट को देखते हुए यह स्पष्ट है कि तकनीक स्वयं समाधान नहीं, बल्कि प्रशासकीय तत्परता और नीति‑निर्धारण की दिशा को सुदृढ़ करने का माध्यम बन सकता है।
अंततः, इस प्रयोग से यह सीख मिलती है कि जब सरकारें शब्दों के बजाय ठोस कार्य‑संकल्प पर जोर देती हैं, तभी छात्र‑स्तर पर वास्तविक मानसिक‑स्वास्थ्य सुधार सम्भव हो पाएगा।
Published: May 4, 2026