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Category: समाज

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लाओ त्ज़ू के विचारों से उजागर भारतीय नीतियों की प्रतिरोधशीलता

‘जीवन निरंतर प्राकृतिक परिवर्तन का क्रम है; उनसे विरोध करना केवल शोक उत्पन्न करता है’ – यह लाओ त्ज़ु का पद्य आज के भारत में नीतिगत अड़चनों का दर्पण बन गया है। जब स्वास्थ्य सेवाओं में अक्षमताएँ, शिक्षा में असमानता और बुनियादी सुविधाओं की कमी स्पष्ट रूप से सामने आती है, तो सरकार के उन निर्णयों को देखना बुनियादी बात है जो परिवर्तन को स्वीकार करने से इनकार करते हैं।

स्वास्थ्य sector में, ग्रामीण इलाकों में बेसिक सुविधा की निरंतर कमी को देखते हुए कई राज्य सरकारें अपना मनोबल ‘प्राकृतिक प्रवाह’ के नाम पर रख रही हैं। यह वही अभिव्यक्ति है जब रोगी अस्पताल की भीड़ में फँसते हैं, जबकि प्रशासन ‘परिवर्तन को रोकना’ ही समाधान मानता है। ऐसी नीति‑परिचालन न केवल रोगी‑परिवार को शोक में डुबोती है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए दीर्घकालिक खतरा बनती है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी समान पैटर्न देखने को मिलता है। स्कूलों में बुनियादी बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी को ‘समय के साथ ठीक हो जाएगा’ कहकर नजरअंदाज किया जा रहा है। यह वही व्यंग्यात्मक ‘प्राकृतिक प्रवाह’ है, जहाँ नीति‑निर्माताओं को असमानता के कारणों की जड़ नहीं, बल्कि उसकी सतह को ही पहचानने की आदत है। परिणामस्वरूप, ग्रामीण‑शहरी अंतर और सामाजिक वर्गों के बीच शिक्षा का अंतर बढ़ता ही जा रहा है।

सिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर की दृष्टि से, जल, sanitation और कचरा निपटान जैसी बुनियादी सुविधाओं पर सरकारी चक्रवात केवल ‘स्थायी बदलाव’ का वादा करता है, जबकि जमीन पर मौजूदा समस्याएँ वहीँ खड़ी रहती हैं। यहाँ भी ‘वास्तविकता को जैसा है वैसा ही रहने देना’ का अप्रत्यक्ष समर्थन नीति‑निर्माताओं के पास मौजूद दृढ़ता को दर्शाता है। जनता की निराशा इस बात में नहीं कि परिवर्तन नहीं आया, बल्कि इस बात में है कि परिवर्तन को नकारने के उपायों को ही निरंतर दोहराया जा रहा है।

इन सबकी पृष्ठभूमि में एक ही सवाल उभरता है – क्या प्रशासनिक अड़चनें वास्तव में ‘प्राकृतिक परिवर्तन’ को रोक रही हैं या वह स्वयं के आरामदायक परिवेश को बनाए रखने का ढोंगी बहाना है? नागरिक जवाबदेही की माँग के सामने, नीति‑कार्यों को अब केवल शब्दों में नहीं, बल्कि ठोस कार्य‑स्थल में बदलना ही केवल ‘परिवर्तन को स्वीकृति’ नहीं, बल्कि इसकी सफलता है। ऐसा न हो कि इतिहास में ‘प्राकृतिक बदलाव’ के साथ प्रतिरोध की कहानी दोहराते‑हुए, हम आगे भी वही शोकभरी परिदृश्य लिखते रहें।

Published: May 8, 2026