जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: समाज

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

रसोई के पीछे छिपे कीड़े-कीट: स्वास्थ्य जोखिम और प्रशासन की चुप्पी

रसोई घर की सामाजिक धड़कन माना जाता है—नाश्ता बनता है, बातचीत होती है, और कई परम्पराओं का केंद्र बनती है। लेकिन वही जगह अक्सर छोटे‑छोटे कीड़ों का स्वर्ग बन जाती है। फ्रिज, डिशवॉशर, माइक्रोवेव तथा अन्य उपकरणों के पीछे न केवल धूल और चिपचिपा पानी जमा होता है, बल्कि अनजाने में रहस्यमयी मेहमानों—कीड़े-कीटों की भी भरमार रहती है।

सामान्यतः पाँच प्रकार के कीड़े इन स्थानों में मिलते हैं: तिलचट्टे (सिल्वरफ़िश), जो नमी वाले कोनों में जना‑जना करके रहस्यमयी ध्वनि करते हैं; चींटियाँ, जो भोजन के टुकड़ों पर आक्रमण करती हैं; फ्रूट फ्लाई, जो फलों और सब्ज़ियों के रस में नहाते हुए उनके ऊपर मंडराते हैं; पैंट्री माउथ, जो अनाज एवं मसालों को खाने के लिए फसलें त्याग देती है; तथा सबसे डरावना तिलचट्टे (कॉकरोच), जो रोगजनकों को ले जा कई बार संक्रमण का कारण बनते हैं।

इन छोटे जीवों की उपस्थिति मात्र झंझट नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर खतरा है। तिलचट्टे और कॉकरोच सल्मोनेला, ई. कोलाई तथा एशेरिशिया जैसी बैक्टीरिया धारण कर भोजन को दूषित कर सकते हैं। फल‑मुंह से उत्पन्न एलेर्जिक प्रतिक्रिया, दमा और अस्थमा की स्थिति को बिगाड़ सकती है। इसके अलावा, इन कीटों की प्रजनन गति तेज़ होने के कारण, एक छोटी सी अवहेलना जल्द ही बड़े संक्रमण का रूप ले लेती है।

इन समस्याओं का सर्वाधिक असर उन परिवारों पर पड़ता है जो निम्न आय वर्ग के आवासीय कोटों में रहते हैं—पुराने फँके हुए अपार्टमेंट, किराये के फ्लैट या सरकारी आवासीय कॉलोनी। पुरानी दीवारें, दरारें, बेकार वाली वेंटिलेशन और अपर्याप्त सफाई के कारण कीड़े-कीटों को सुरक्षित आश्रय मिलता है। अक्सर इन घरों में नियमित कीट‑नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं रहती, और वह भी अगर हो, तो वह केवल एक बार की दवा देने तक सीमित रहती है।

शहर प्रशासन की प्रतिक्रिया, यद्यपि मौखिक तौर पर “स्वच्छ घर” की घोषणा करती है, पर वास्तविक कार्य में कई खामियां स्पष्ट हैं। नगर स्वास्थ्य विभाग की नियमित निरीक्षण रिपोर्टें अक्सर अनुपलब्ध रहती हैं; फीडबैक तंत्र बिगड़ गया है, जिससे शिकायतें कहीं खो जाती हैं। बजट पर्ची में कीट नियंत्रण के लिए आरक्षित निधि घटती दिखती है, जबकि निजी पेस्ट कंट्रोल कंपनियों को अनुबंधित करना साधारण प्रक्रिया बन गया है—परन्तु उनके कार्य की मान्यता, क्षमता एवं पर्यावरणीय सुरक्षा की कोई निगरानी नहीं। नीतिगत स्तर पर, किराये के आवासों में “वार्षिक फ्यूमिगेशन” को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव कई वर्षों से लटकता आ रहा है, लेकिन वास्तविक नियमावली में अब भी “आवश्यकता पर” ही उल्लेख है।

सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य की असमानता को उजागर करती है, बल्कि प्रशासनिक उत्तरदायित्व की असमानता भी। नागरिक अपनी समस्याओं को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने लगते हैं, स्थानीय नेताओं से पूछते हैं—परन्तु उत्तर अक्सर “जाँच जारी है” या “अन्य प्राथमिकताओं के कारण देरी” तक सीमित रहता है। यह वही “स्वच्छता अभियान” का व्याकरणिक विरोधाभास है, जहाँ जश्न के साथ‑साथ छिपे हुए कीड़े भी “स्वागत” कर रहे हैं।

ऐसे परिदृश्य में समाधान केवल पुर्न-ध्यान नहीं, बल्कि ठोस नीति‑क्रियान्वयन है: सभी किराये के आवासों में दो‑सालाना कीट‑निरीक्षण अनिवार्य करना, बजट में कीट‑नियंत्रण के लिये स्पष्ट आवंटन सुनिश्चित करना, और नागरिकों को शिकायत दर्ज करने के लिये डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली लागू करना। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक-निजी भागीदारी के ढाँचे में पर्यावरण‑सुरक्षित कीटनाशकों के उपयोग को प्रोत्साहन देना आवश्यक है, ताकि स्वास्थ्य को ख़तरे में डाले बिना “कीट‑मुक्त” वातावरण बनाया जा सके।

जब तक प्रशासनिक निकाय इस समस्या को केवल “छोटा‑मोटा” नहीं समझेंगे, तब तक रसोई ही नहीं, बल्कि पूरे घर की शांति असुरक्षित रहेगी।

Published: May 7, 2026