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Category: समाज

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रात में खर्राटे: कब स्वास्थ्य चेतावनी बनते हैं?

खर्राटे, जो अक्सर पारिवारिक दहशत की तरह सुनाई देते हैं, को अधिकांश लोग बस रात्रि का शोर मान देते हैं। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह निरंतर शोर कभी‑कभी अधिक गंभीर बीमारियों की सतर्कता हो सकता है।

वैज्ञानिक अनुसंधान से पता चला है कि लगातार और भारी खर्राटे अक्सर ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) का प्रारम्भिक संकेत होते हैं। यह स्थिति न केवल नींद की गुणवत्ता गिराती है, बल्कि उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों का जोखिम भी बढ़ाती है। भारत में अनुमानित 5‑10 प्रतिशत वयस्कों को OSA का सामना करना पड़ता है, परन्तु निदान की दर बहुत कम है।

देश की अधिकांश स्वास्थ्य प्रणाली में नींद विकारों को अभी तक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के अंतर्गत नहीं जोड़ा गया है। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NPCDCS) में हृदय‑मधुमेह‑कैन्सर पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जबकि नींद‑संबंधी बीमारियों को नज़रअंदाज़ किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में बहु‑पक्षीय बहु-उपकरण वाले स्लीप लैब्स की अनुपलब्धता, उच्च लागत और बीमा कवरेज की घोर कमी, निदान के प्रमुख बाधक बन गए हैं।

ऐसे में, जब कोई नागरिक लगातार खर्राटे से नींद नहीं पा रहा हो, तो उसके पास न तो सुलभ परीक्षण है, न ही उचित परामर्श। कई राज्य सरकारें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में एएनएम और एएसएचए कर्मचारियों को इस बारे में प्रशिक्षित करने में माँगी गई पहल को बायलेट कर रही हैं। परिणामस्वरूप, लोग अपना स्वास्थ्य जोखिम पहचानने से पहले ही अपने कंधे पर बोझ लेकर सोते रहे हैं।

सरकारी नीतियों में इस अंतराल को पाटने के लिए, नींद विकारों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत शामिल करना आवश्यक है। स्लीप एपनिया के स्क्रीनिंग को आयु, लिंग, मोटापे और धूम्रपान जैसी जोखिम कारकों के आधार पर मौजूदा पोषक‑वित्तीय अभिकल्पनाओं में जोड़ना चाहिए। साथ ही, नियोक्ताओं को कार्यस्थल में नियमित नींद‑स्वास्थ्य जांच की अनिवार्यता के बारे में जागरूक करना चाहिए, ताकि दुर्घटनाओं और उत्पादन क्षमता में कमी को रोका जा सके।

व्यंग्य यही है कि जब तक नीति निर्माता अपने कानों में बर्थ वाले खर्राटे को बंद नहीं करेंगे, तब तक इस शोर के पीछे छिपे स्वास्थ्य‑खतरे को नजरअंदाज करना सरल रहेगा। पर वास्तविक आंकड़े, जीवित मृत्यु और आर्थिक बोझ स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि इस ‘शोर’ को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

समाज के हर वर्ग को अब यह समझना चाहिए कि खर्राटे केवल शोर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य‑जागरूकता की पहली घंटी हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में नींद‑विकारों को प्राथमिकता देकर, भारत अपने नागरिकों को स्वस्थ, सुरक्षित और जागरूक भविष्य की दिशा में ले जा सकता है।

Published: May 7, 2026