रैज वर्कआउट: नई फिटनेस ट्रेंड के पीछे छुपा जोखिम और प्रशासनिक चूक
देश के बड़े शहरों में जिम के फर्श पर ‘रैज वर्कआउट’ का शोर गूँज रहा है। ये वर्ग‑विशिष्ट कक्षाएँ प्रतिभागियों को हथौड़े से टायर मारने, भारी वजन फेंकने और तेज़ गुनगुनाहट के साथ कसरत करने के लिए प्रेरित करती हैं। विज्ञापन में इसे ‘आक्रोश को शारीरिक ऊर्जा में बदलने’ का दावा किया जाता है, जबकि वास्तविकता कई बार इस दावे से कहीं अधिक जटिल साबित हुई है।
व्यायाम‑प्रेमियों के लिए यह नया रूप जरूर रोमांचक लग सकता है, परंतु विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक आक्रामक शारीरिक क्रिया का मनोवैज्ञानिक लाभ अनिश्चित है। ‘कैथार्सिस’ के सिद्धांत को तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक यह स्पष्ट न हो कि गुस्से को विस्फोटक शक्ति में बदलने से लंबी अवधि में तनाव घटता है या फिर नई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
सामाजिक दृष्टि से देखें तो यह ट्रेंड मुख्यतः मध्य‑वर्गीय युवाओं को आकर्षित करता है, जो कार्य‑स्थल के दबाव से बाहर निकलने के लिए तेज़‑तर्रार समाधान चाहते हैं। हालांकि, सुरक्षा मानकों की कमी के कारण कई बार चोटें भी आम हो रही हैं। साज‑सज्जा में अक्सर भारी हथौड़ा, लोहे की पली या मोटी टायर की व्यवस्था होती है, पर औपचारिक सुरक्षा उपकरण या प्रशिक्षकों की प्रमाणिकता का अभाव देखने को मिलता है।
ऐसे माहौल में स्वास्थ्य मंत्रालय और स्थानीय नगर पालिकाओं की जवाबदेही प्रश्नवाचक बनी हुई है। अभी तक कोई राष्ट्रीय दिशा‑निर्देश जारी नहीं किए गए हैं जो इन अत्यधिक तीव्र कक्षाओं के संचालन, प्रशिक्षकों की योग्यता या प्रतिभागियों की बीमा व्यवस्था को नियंत्रित करे। कई शहरों में मौजूदा खेल‑सुविधा नियमों को ‘रैज वर्कआउट’ जैसे नव‑उद्यमों पर लागू करना कठिन साबित हो रहा है, जिससे प्रशासनिक लापरवाही का दूषित संकेत मिल रहा है।
नागरिक संघों ने भी इस मुद्दे पर आवाज़ उठाई है। वे कहते हैं कि अगर सरकार इस प्रकार के अनियंत्रित व्यायाम को वैध मानती है, तो यह न केवल उपभोक्ताओं की सुरक्षा को खतरे में डालता है, बल्कि स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर अतिरिक्त बोझ भी डाल सकता है—जैसे चोटों के इलाज या मानसिक स्वास्थ्य पर बिखरते प्रभाव।
विस्तृत प्रभाव की बात करें तो यह अनियमितता सामाजिक असमानता को भी बढ़ा सकती है। उच्च वर्ग के जिम में इन कक्षाओं के लिए विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं, जबकि सामान्य जनसंख्या ऐसी महंगाई वाली, जोखिम भरी सेवाओं से बचे रहेंगे। इस प्रकार एक ही फिटनेस ट्रेंड दोहरी सामाजिक रेखा खींच रहा है—कुछ के लिए उत्साह, तो कुछ के लिए असुरक्षा।
निष्कर्षतः, रैज वर्कआउट का उदय भारत में फिटनेस की नई राह प्रस्तुत करता है, परन्तु सुरक्षा, मनोवैज्ञानिक प्रमाणिकता और नियामक ढाँचा न होने पर यह अधिकतर ‘जोरदार शोर’ बन ही रहेगा। यह आवश्यक है कि नीति‑निर्माता, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और स्थानीय प्रशासन मिलकर स्पष्ट नियमावली तैयार करें, ताकि ऊर्जा का सही उपयोग हो और किसी को भी ‘रैज’ के नाम पर शारीरिक या मानसिक नुक़सान न सहना पड़े।
Published: May 5, 2026