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Category: समाज

राज्य परिषद ने बाढ़ नियंत्रण के लिये बीवर रिहाई को मंजूरी, नीति में पार्टी के भीतर फूट

उत्तर प्रदेश की एक जिला परिषद ने भारी बारिश से उत्पन्न जल‑संकट को घटाने के उपाय के रूप में जंगली बीवर (बेज़रो) को स्थानीय नदियों और जलाशयों में छोड़ने की मंजूरी दी। यह कदम पार्टी के भीतर प्राकृतिक पुनर्यवन (rewilding) नीति पर तीखे विचार‑विमर्श के बीच आया है, जहाँ कई सांसद इस कदम को कृषि‑उत्पादन और ग्रामीण जीवन के लिये खतरा मानते हैं।

बीवर को जलधारा के किनारे रहने वाले बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करने, जल‑स्तर को स्थिर करने और बाढ़‑प्रवण क्षेत्रों में जल‑स्रोतों के निरंतर प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिये पेश किया गया है। परन्तु इस विचार के पीछे उचित वैज्ञानिक मूल्यांकन या स्थानीय किसानों की राय को सम्मिलित करने की विसंगति स्पष्ट है। पिछले दो वर्षों में ही परिषद ने कई बड़ी बाढ़ निवारण परियोजनाओं को रद्द किया या अधूरे छोड़ दिया, जिससे स्कूल बंद, स्वास्थ्य‑क्लिनिक पर रोग‑भार बढ़ा और महिलाओं एवं श्रमिकों को असुरक्षित स्थिति का सामना करना पड़ा।

स्थानीय सामाजिक समूहों ने इस योजना को “प्रतीकात्मक” कहा, क्योंकि बीवर का भारत में कोई ऐतिहासिक अस्तित्व नहीं है और उनका अभिप्रायित पर्यावरणीय लाभ अभी तक सिद्ध नहीं हुआ है। वे यह भी जोड़ते हैं कि प्रशासन ने पहले ही जल‑प्रबंधन के मूलभूत मुद्दों—जैसे जल निकासी की दुर्दशा, पुरानी जल‑नियंत्रण प्रणाली और अपर्याप्त शहरी‑ग्रामीण बुनियादी ढाँचा—को प्राथमिकता नहीं दी।

पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता इस रिहाई को “नीति‑असंगति” और “फजूल खर्च” के रूप में आलोचना करते हुए, अधिक प्रभावी जल‑संरक्षण उपायों पर केन्द्रित होने की पुकार कर रहे हैं। वहीं, परिषद के मुखिया ने कहा कि यह कदम “विज्ञान‑उन्मुख” है और “भविष्य के जल‑संकटों के लिए पूर्व‑तैयारी” है, भले ही वास्तविक कार्यान्वयन के लिये आवश्यक बजट, प्रशिक्षण और निगरानी व्यवस्था अभी अधूरी रह गई है।

यह मामला प्रशासनिक लापरवाही और नीति‑निर्धारण में पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में बाढ़ के कारण हर साल लाखों रुपये की आर्थिक क्षति और जनस्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, तब भी ऐसी अल्पकालिक, अटकलों पर आधारित योजनाएँ नागरिकों के भरोसे को घटा रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, बाढ़‑रोक थाम के लिए दीर्घकालिक जल‑संरचना, स्कूल‑उपकरण की सुरक्षा, स्वास्थ्य‑सेवा की निरंतरता तथा सामाजिक समीक्षात्मक भागीदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि अजीबो-गरीब जानवरों की रिहाई से “उपचार” करने की कोशिश।

Published: May 3, 2026