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महिलाओं के फिटनेस मार्गदर्शन में लिंग‑विशिष्ट अंतर: नीति‑निर्माताओं की चुप्पी पर सवाल
हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय खेल‑विज्ञान में यह दावा सुना जा रहा है कि ‘महिलाएँ छोटे पुरुष नहीं हैं’। यह सिद्धान्त कई सामाजिक मंचों पर चर्चा का विषय बन गया है, जहाँ विशेषज्ञों ने बताया कि पिरियड, गर्भावस्था और रजोनिवृत्ति जैसी शारीरिक प्रक्रियाएँ व्यायाम के प्रभाव को बदल देती हैं। विश्व स्तर पर इस बात को स्वीकार करने वाले वैज्ञानिकों में डॉ. स्टेसी सिम्स प्रमुख हैं, लेकिन क्या यह बदलाव भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में परिलक्षित हो रहा है?
भारत में फिटनेस से जुड़ी अधिकांश आधिकारिक दिशानिर्देश अभी भी पुरुष‑प्रधान अध्ययनों पर आधारित हैं। राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा कार्यक्रम में प्रस्तुत सत्र‑सहभागी तालिकाओं में नारी‑विशिष्ट हार्मोनल परिवर्तन का उल्लेख मिलना दुर्लभ है। परिणामस्वरूप, 40‑से‑ऊपर आयु वर्ग की कई महिलाएँ उच्च‑तीव्रता वाले कार्डियो‑त्रेनिंग को निरन्तर जारी रखने की सलाह पर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं, जबकि वैज्ञानिक संकेत देते हैं कि इस उम्र में हार्मोनात्मक बदलाव के कारण पुनरुत्थान‑उपचार की आवश्यकता अधिक होती है।
सामाजिक दृष्टिकोण से यह समस्या सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए अनिवार्य व्यायाम व्यवस्था, स्कूलों में शारीरिक शिक्षा के समय‑सारणी, तथा सार्वजनिक जिमों में सुविधा‑सुरक्षा की कमी, सब मिलकर एक बड़ा असमानता उत्पन्न करती हैं। जब सरकारी रिपोर्टें ‘खेल को सभी के लिए’ का घोषणापत्र देती हैं, तो वास्तविक जमीन पर महिलाओं के लिए अलग‑अलग व्यायाम‑रूपरेखा और प्रशिक्षण सुविधा प्रदान करना अभी भी सपना है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया की बात करें तो, स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाल ही में लिंग‑समावेशी नीति के मसौदे पर चर्चा का संकेत दिया था, परन्तु वह भी ‘रिपोर्टिंग लाइन’ तक सीमित रहा। इसी समय, निजी जिम श्रृंखलाओं ने ‘फेमिनिन फिटनेस’ नाम से विशेष क्लासेज़ शुरू कर दिए, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि बाजार‑आधारित समाधान में ही परिवर्तन की गति है, न कि सार्वजनिक योजना में। ऐसी स्थिति में जनता को ‘स्वयं‑सुधार’ के अल्गोरिदम पर निर्भर रहना पड़ता है—जैसे ही डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर कोई नई अवधारणा आती है, वह तुरंत लोकप्रिय हो जाती है, जबकि सरकारी दस्तावेज़ों में वह शब्दावली आज़ीब ही लगती है।
व्यावहारिक परिणाम साफ़ हैं: 40‑सेंकड़ो महिलाएँ, जो अपने हार्मोनल बदलाव को अनदेखा कर तीव्र कार्डियो पर जोर देती थीं, अब चोटों और थकान की शिकायत कर रही हैं। वहीं, स्वास्थ्य बीमा एवं सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में उनके इन विशेष आवश्यकताओं को सम्मिलित करने की कोई स्पष्ट दिशा नहीं दिखती। अंततः, यह असमानता न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता और सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों को भी धुंधला करती है।
समाज को यह प्रश्न उठाना चाहिए—क्या ‘सभी के लिए समान अवसर’ का दावा तब तक वैध है, जब लिंग‑विशिष्ट विज्ञान को नीति‑निर्माण में जगह नहीं मिलती? अगर सरकार अपनी वही पुरानी ‘समानता’ की बात दोहराती रहे, तो महिलाओं को खुद ही अपने शरीर की जटिलताओं को समझने के लिए ‘डॉ. सिम्स’ के न्यूनतम‑व्याख्यानों पर भरोसा करना पड़ेगा।
Published: May 7, 2026