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Category: समाज

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मस्तिष्क की धमनियों के प्रसार से लैकूनर स्ट्रोक – दवा की अनुत्तरदायीत्व की जड़

एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन ने लैकूनर स्ट्रोक के कारण पर एक नई रोशनी डाली है। पहले माना जाता था कि ये स्ट्रोक मस्तिष्क की धमनियों में वसायुक्त जमाव के कारण होते हैं, पर अब पता चला है कि धमनियों का धीरे‑धीरे पतला‑विस्तारित होना—जिन्हें आम तौर पर ‘एरीटोसक्लेरोसिस’ कहा जाता है—मुख्य कारण है। यह खुलासा न केवल रोग की मूलभूत समझ को बदलता है, बल्कि यह भी बताता है कि क्यों कई दवाएँ, विशेषकर एंटी‑प्लेटलेट और कोलेस्ट्रॉल‑कम करने वाली दवाएँ, अपेक्षित लाभ नहीं दे पातीं।

भारत में लैकूनर स्ट्रोक की घटना धीरे‑धीरे बढ़ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, वार्षिक लगभग 1.2 करोड़ स्ट्रोक मामलों में से लगभग 25 % लैकूनर स्ट्रोक हैं, अर्थात् दसियों लाख लोग इस प्रकार के न्यूरो‑वैज्ञानिक क्षति का सामना कर रहे हैं। अधिकांश मामलों में रोगी कम आय वाले क्षेत्रों से होते हैं, जहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच सीमित है, और रक्तचाप, मधुमेह व धूम्रपान जैसी जोखिम कारकों का पता लगाना भी असंभव बना रहता है।

इस नई खोज के सामने स्वास्थ्य प्रशासन की मौजूदा नीतियों में स्पष्ट अंतराल उजागर हो रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में अभी तक धमनियों के प्रसार को रोकने के लिए विशेष स्क्रीनिंग या प्रिवेंटिव प्रोटोकॉल नहीं जोड़े गए हैं। साथ ही, औषधीय उपचार पर अत्यधिक निर्भरता ने वह वास्तविक कारण—धमनियों की पतली‑विस्तार—को नजरअंदाज़ किया है, जिससे मरीजों को अपेक्षित राहत नहीं मिल पाती। कुछ राज्यों में ही वास्कुलर इमेजिंग के लिये फंडिंग उपलब्ध है, और जब भी उपलब्ध होती है तो वह अक्सर भू‑स्थापित जिलों में नहीं पहुँच पाती।

सामाजिक प्रभाव गहरा है। लैकूनर स्ट्रोक अक्सर न्यूनतम चेतावनी संकेतों के साथ अचानक उत्पन्न होते हैं, जिससे कार्यरत आयु वर्ग के लोग रोजगार से बाहर हो जाते हैं, और उनके परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। ग्रामीण एवं शहरी गरीबों को न केवल इलाज की लागत बल्कि पुनर्वास के लिये आवश्यक उपकरण और विशेषज्ञ देखभाल भी नहीं मिल पाती। इस स्थिति में सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का कवरेज बहुत सीमित है; कई बार तो दवा की निरर्थक डोज़ ही अनुदानित की जाती है।

वहीं, प्रशासनिक प्रतिक्रिया में अक्सर केवल “रिसर्च को अपनाने के लिए दिशानिर्देश तैयार किए जाएंगे” जैसी मानक प्रतिक्रियाएँ दी जाती हैं, जबकि वास्तविक कार्यान्वयन में देरी और बजट असंगतता बनी रहती है। यह वही बात है, जिसमें “बिना दिये काम का शब्द” का प्रयोग आम हो गया है।

संकल्पना स्पष्ट है: यदि धमनियों के प्रसार को रोकना ही लैकूनर स्ट्रोक को नियंत्रित करने की कुंजी है, तो नीतियों को भी उसी दिशा में मोड़ना चाहिए। इसका अर्थ है:

जब तक ये ठोस कदम नहीं उठाए जाते, लैकूनर स्ट्रोक का बोझ बढ़ता रहेगा, और दवा‑पर्याप्ती का झूठा आश्वासन केवल एक ‘समय की बर्बादी’ ही रहेगा। यह समय है कि नीति‑निर्माता, चिकित्सक और समाज मिलकर इस नई वैज्ञानिक समझ को व्यावहारिक कार्रवाई में बदलें—क्योंकि अंततः ‘संकट’ शब्द का अर्थ तभी पूरा होते हैं जब वह ‘समाधान’ के साथ तालमेल में हो।

Published: May 7, 2026