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Category: समाज

मध्यम बाल विश्व दिवस: एक मिलियन नई दाइयों की आवश्यकता, नीति‑जवाबदेही की कमी

5 मई को अंतरराष्ट्रीय दाई दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष थीम ‘one million more’ (एक मिलियन अधिक) है, जिसका अर्थ है विश्व स्तर पर दाइयों की कमी को दर्शाना। भारत में भी यह कमी गंभीर प्रभाव डाल रही है, जहाँ कई ग्रामीण एवं दूरस्थ इलाकों में प्रसव‑संबंधी मृत्यु दर अभी भी उच्च स्तर पर बनी हुई है।

एक युवा पत्रकार ने बताया कि उसकी माँ को बचाने वाली दाई ने न केवल उसके जीवन को संभाला, बल्कि उससे गहरा प्रभाव भी डाला। उस बचाव घटना ने उसे दाई बनना सिखा दिया – एक ऐसी कहानी जो कई भारतीय परिवारों की अंधेरी वास्तविकता को उजागर करती है, जहाँ स्वास्थ्य कर्मियों की अनदेखी कभी‑कभी जीवन‑रक्षक बन जाती है।

परंतु, इस व्यक्तिगत प्रेरणा के विपरीत, नीति‑निर्माताओं ने अभी तक ‘एक मिलियन अधिक दाइयों’ की घोषणा को ठोस कार्य योजना में नहीं बदला। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में दाइयों की भर्ती, प्रशिक्षण एवं सुदृढ़ीकरण के लिए बजट आवंटन अक्सर ही अल्पसंख्यक रह गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 तक भारत में लगभग 5.8 मिलियन दाइयों की आवश्यकता थी, जबकि वास्तविक संख्या लगभग 3.6 मिलियन ही रही।

व्यवस्थागत लापरवाही का प्रभाव केवल आँकड़ों में नहीं, बल्कि महिलाएँ और बच्चे जिनकी दाई‑सहायता विफल रहती है, उन पर स्पष्ट रूप से दिखता है। कई राज्यों में दाइयों को समय पर वेतन, बीमा या जोखिमभरे कार्य के लिये उचित सुरक्षा नहीं मिलती, जिससे नौकरी छोड़ने की दर बढ़ रही है। यह स्थिति न केवल मौजूदा पेशेवरों को हतोत्साहित करती है, बल्कि युवा aspirants को भी इस व्यवसाय से दूर कर देती है।

ऐसे में, विपक्षी दल और स्वास्थ्य संगठनों ने सरकार से मांग की है कि दाइयों के प्रशिक्षण केंद्रों की संख्या दोगुनी की जाये, अनुदान व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाये और कार्यस्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाये। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि दाइयों को केवल ‘पर्यटक’ नहीं, बल्कि मातृ‑शिशु स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ माना जाना चाहिए, और इसके लिये बजट में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखी जाय तो, मौजूदा नीति‑निर्माण प्रक्रिया में ‘डाटा‑ड्रिवन निर्णय’ की कमी स्पष्ट है। कई बार तो दाइयों की जरूरत को लेकर किए गए सर्वेक्षण ही अर्द्ध‑पर्याप्त आंकड़ों पर आधारित होते हैं, जबकि वास्तविक ग्राउंड‑लेवल जरूरतों को समझने के लिये व्यापक फील्ड‑रिसर्च की आवश्यकता है। यह ‘डेटा‑पर‑डेटा’ की चक्रीय त्रुटि प्रशासनिक उपेक्षा को और भी गहरा बनाती है।

उपसंहार में कहा जा सकता है कि दाइयों की कमी केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक असमानता का प्रतिबिंब है। जब एक युवा अपनी माँ के जीवित रहने के बाद दाई बनने का संकल्प लेता है, तो यह इस बात का संकेत है कि व्यावहारिक समाधान की आवश्यकता कच्ची है। यदि सरकार अपनी लापरवाही को बनाए रखेगी, तो ‘one million more’ केवल एक घोषणात्मक नारा बन कर रह जाएगा, और मातृ‑शिशु मृत्यु दर की आँकड़े वही रहेंगे।

Published: May 6, 2026