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Category: समाज

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मध्य आयु अल्जाइमर जीन वाले परिवारों का अनुसंधान नेटवर्क खतरे में, नीति विफलता उजागर

भारत में कुछ ही परिवारों में दुर्लभ जीन उत्परिवर्तन के कारण अल्जाइमर रोग मध्य आयु में शुरू होता है। ये परिवार न केवल अपने आप को रोग के प्रकोप से जूझते हुए देखते हैं, बल्कि वैज्ञानिकों को एक अनूठा परीक्षण मंच भी प्रदान करते हैं, जिससे संभावित उपचारों की जल्दी जाँच संभव होती है।

जीन-आधारित शोध नेटवर्क ने शोधकर्ताओं को रोग की प्रगति, बायोमार्कर और रोगी‑विषिष्ट प्रतिक्रिया को समय‑सापेक्षित रूप से ट्रैक करने की सुविधा दी है। इससे नई दवाओं के चरण‑I एवं चरण‑II क्लिनिकल ट्रायल की अवधि घटाकर महीनों में लाया जा सकता है, जो सामान्यतः वर्षों लेती हैं।

इन परिवारों की सामाजिक स्थिति भी समान रूप से नाज़ुक है। रोग का प्रारम्भिक रूप अक्सर कार्य‑क्षमता को घटा देता है, जिससे उनका आर्थिक भार बढ़ जाता है। देखभाल‑सहायता लागत, कार्य‑स्थल से विस्थापन और सामाजिक कलंक इन पर अतिरिक्त बोझ बनते हैं, जबकि उनका वैज्ञानिक योगदान देश‑व्यापी स्वास्थ्य सुधार में अहम माना जाता है।

परंतु इस महत्त्वपूर्ण नेटवर्क को अब वित्तीय असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के हालिया बजट प्रतिबंधों ने दीर्घकालिक अनुदान को घटा दिया है, और कई राज्य स्तर के प्रयोगशालाएँ अपने अनुसंधान सहयोग को रोक रही हैं। डेटा‑सुरक्षा एवं गोपनीयता नियमों में अस्पष्टता ने निजी फ़ार्मा कंपनियों को इस पहल में निवेश करने से हतोत्साहित किया है।

जब पूछे गया कि इस गिरते हुए संदर्भ को कैसे सुधारा जाये, तो प्रशासन ने “इसे महत्त्वपूर्ण मानते हुए” कहा, पर वास्तविक कार्यवाही में देरी और पारदर्शिता की कमी स्पष्ट है। बजट आवंटन का विस्तृत विवरण कभी सार्वजनिक नहीं किया गया, और जो निधि जारी हुई, वह भी अनिश्चितकालीन परियोजनाओं के लिये मात्र “अस्थायी” कहा गया। असली सवाल यह रह जाता है कि किन नागरिकों को प्राथमिकता दी जा रही है – उन लोगों को जिन्हें अब तक रोग का मुखौटा नहीं दिखा, या उन परिवारों को जो इस तकनीकी विकास की रीढ़ हैं।

अल्जाइमर रोग का वैश्विक आर्थिक बोझ हर साल सैंकड़ों बिलियन डॉलर तक पहुँचता है। यदि भारत के इस विशिष्ट जीन नेटवर्क को स्थायी समर्थन मिला तो न केवल देश की दवा विकास शक्ति बढ़ेगी, बल्कि रोग के प्रबंधन में सामाजिक‑आर्थिक असमानता को भी घटाया जा सकेगा। यह एक ऐसा अवसर है जहाँ नीति‑निर्माताओं को वैज्ञानिक तर्क के साथ‑साथ मानवतावादी दायित्व को भी अपनाना चाहिए।

सारांश में, यह स्पष्ट है कि सार्वजनिक‑निजी भागीदारी, स्थिर फंडिंग और स्पष्ट नियामक ढांचा ही इस दुर्लभ लेकिन प्रासंगिक रोग‑शोध नेटवर्क को बचा सकेंगे। अन्यथा, प्रशासन का यह रवैया कि “न्यायिक प्रक्रिया में सुधार के बाद” ही मदद पहुँचेगी, केवल वादे ही रह जाएंगे, और उन परिवारों की जिंदगी—जो अपने स्वयं के मस्तिष्क के साथ ही लड़ रहे हैं—और अधिक असुरक्षित हो जाएगी।

Published: May 7, 2026